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भारतीय हस्तशिल्प (Indian Handicrafts)

धातु और पाषाण शिल्प (Metal & Stone Crafts)

  • ढोकरा कला (ओडिशा/छत्तीसगढ़): इस प्राचीन शिल्प में ‘लुप्त मोम तकनीक’ (Lost-wax casting) का उपयोग करके सुंदर जनजातीय धातु की मूर्तियां बनाई जाती हैं।
  • बिदरीवेयर (कर्नाटक): जस्ता और तांबे के मिश्रण पर चांदी की बारीक नक्काशी करने की यह एक अनोखी मध्यकालीन शिल्प कला है।
  • पेम्बारथी धातु शिल्प: तेलंगाना के इस शिल्प में पीतल की चादरों पर बारीक नक्काशी करके बर्तनों और मूर्तियों को सजाया जाता है।
  • संगमनेर पचकारी (काष्ठ/धातु): लकड़ी या संगमरमर के आधार पर कीमती धातुओं और हाथीदांत की जड़ों को बिठाने की कला।
  • जयपुर संगमरमर शिल्प: राजस्थान का यह शिल्प सफेद मकराना संगमरमर पर देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां और नक्काशीदार सामान बनाने के लिए प्रसिद्ध है।

मिट्टी और कांच शिल्प (Pottery & Glassware)

  • ब्लू पॉटरी (जयपुर): मुल्तानी मिट्टी और कांच के मिश्रण से बने बर्तनों पर नीले-हरे रंगों से चित्रकारी करने की कला।
  • खुरजा पॉटरी (उत्तर प्रदेश): रंग-बिरंगे चीनी मिट्टी (सिरेमिक) के घरेलू बर्तनों और कलाकृतियों के निर्माण के लिए यह क्षेत्र विख्यात है।
  • निज़ामाबाद ब्लैक पॉटरी: उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में मिट्टी के बर्तनों को विशेष तकनीक से चमकीला काला रंग दिया जाता है।
  • फिरोजाबाद कांच शिल्प: इसे भारत की ‘कांच की नगरी’ कहते हैं, जो अपनी रंग-बिरंगी कांच की चूड़ियों और कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध है।
  • टेराकोटा शिल्प (गोरखपुर): पकी हुई मिट्टी से हाथ द्वारा बनाए जाने वाले सुंदर जानवरों (विशेषकर घोड़ों) के लिए इसे जीआई (GI) टैग प्राप्त है।

वस्त्र एवं कढ़ाई शिल्प (Textiles & Embroidery)

  • जरदोजी कढ़ाई: मुगल काल की इस प्रसिद्ध कला में सोने और चांदी के धागों (जरी) से मखमली कपड़ों पर भारी नक्काशी की जाती है।
  • चिकंकारी (लखनऊ): सूती या मलमल के कपड़ों पर सफेद सूती धागों से की जाने वाली यह अत्यंत महीन और कोमल हाथ की कढ़ाई है।
  • फुलकारी (पंजाब): इसका अर्थ ‘फूलों का काम’ है, जिसमें रंग-बिरंगे रेशमी धागों से ज्यामितीय आकृतियों में शॉल और दुपट्टे कढ़े जाते हैं।
  • कांथा कढ़ाई (बंगाल): ग्रामीण महिलाओं द्वारा पुरानी साड़ियों और धोतियों को जोड़कर रंगीन धागों से की जाने वाली पारंपरिक सिलाई कला।
  • सुजनी कढ़ाई (बिहार): पुराने कपड़ों की परतों को आपस में सिलकर उन पर सामाजिक विषयों की बारीक कहानियां उकेरने की अनूठी कला।
  • कसूती कढ़ाई (कर्नाटक): बिना किसी खाके के कपड़ों पर हाथ से सुई-धागे द्वारा मंदिरों और पालकियों के सुंदर पैटर्न बनाना।

बुनाई और हाथकरघा (Weaving & Handloom)

  • बनारसी रेशम (उत्तर प्रदेश): अपनी उत्कृष्ट रेशम बुनाई और सोने-चांदी के तारों (जरी) के भारी काम वाले बॉर्डरों के लिए दुनिया भर में मशहूर।
  • कांचीपुरम साड़ी (तमिलनाडु): शुद्ध शहतूत रेशम और सोने की जरी से बुनी जाने वाली यह दक्षिण भारत की सबसे भव्य साड़ी शिल्प है।
  • पटोला बुनाई (गुजरात): पाटन की ‘इकत’ तकनीक वाली यह दोहरी बुनाई कला है, जिसमें धागों को बुनने से पहले ही रंगा जाता है।
  • चंदेरी और माहेश्वरी: मध्य प्रदेश के ये करघा शिल्प सूती और रेशमी धागों के मिश्रण तथा सुंदर किनारियों (बॉर्डर) के लिए जाने जाते हैं।
  • पोचमपल्ली इकत (तेलंगाना): अपने अनूठे ज्यामितीय डिजाइनों और सम्मोहनकारी रंगाई तकनीकों के कारण इसे भारत की ‘सिल्क सिटी’ का गौरव प्राप्त है।

लकड़ी और अन्य शिल्प (Wood, Leather & Miscellaneous)

  • चन्नापटना खिलौने (कर्नाटक): हाथीदांत की लकड़ी और प्राकृतिक रंगों से बने ये पर्यावरण-अनुकूल खिलौने पूरी दुनिया में अपनी चमक के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • सहारनपुर काष्ठ शिल्प: उत्तर प्रदेश का यह शहर शीशम की लकड़ी पर जटिल और बारीक जालियों वाली नक्काशी के लिए जाना जाता है।
  • कोल्हापुरी चप्पल (महाराष्ट्र): भैंस की त्वचा से हाथ द्वारा बनाई जाने वाली यह बेहद मजबूत, टिकाऊ और पारंपरिक चमड़े की चप्पल है।
  • कठपुतली शिल्प (राजस्थान): आम की लकड़ी और रंग-बिरंगे कपड़ों से धागे वाली ‘कठपुतली’ बनाने की यह सदियों पुरानी लोक कला है।
  • पिनशिल्प (सिक्किम/पूर्वोत्तर): बांस और बेंत को पतली पट्टियों में काटकर टोकरियां, कुर्सियां और दैनिक जीवन के सुंदर सामान बनाने की कला।
  • सोलापिथ शिल्प (पश्चिम बंगाल): पानी के पौधों की सूखी मज्जा (स्पंज) से मंदिरों के सजावटी सामान और शादियों के मुकुट बनाने की कला।
  • मैसूर सैंडलवुड शिल्प: चंदन की सुगंधित लकड़ी पर बारीक नक्काशी करके हाथ के पंखे, बक्से और सुंदर आकृतियां तैयार करना।
  • कोंडापल्ली खिलौने (आंध्र प्रदेश): स्थानीय नरम लकड़ी (पुनिकी) से बनाए जाने वाले ये खिलौने मुख्य रूप से ग्रामीण जीवन के दृश्यों को दर्शाते हैं।
  • भौगोलिक संकेतक (GI Tag): भारतीय हस्तशिल्प को वैश्विक पहचान देने और चोरी रोकने के लिए सरकार द्वारा अब तक सैकड़ों शिल्पों को जीआई टैग दिया गया है।

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