उग्र राष्ट्रवाद के उदय के कारण (Causes of Militant Nationalism)
उदारवादियों से निराशा: कांग्रेस के शुरुआती नेताओं की ‘याचिका और प्रार्थना’ की शांतिपूर्ण नीतियां युवाओं को आकर्षित करने और अधिकार दिलाने में पूरी तरह असफल रहीं।
अंतरराष्ट्रीय प्रभाव: जापान द्वारा रूस को हराने (1905) और इथियोपिया की इटली पर विजय ने यूरोपीय अजेयता के भ्रम को तोड़ दिया।
लॉर्ड कर्जन की नीतियां: कर्जन के दमनकारी कानूनों जैसे कलकत्ता कॉर्पोरेशन एक्ट और विश्वविद्यालय अधिनियम ने भारतीयों में ब्रिटिश विरोधी गुस्सा भड़काया।
बंगाल विभाजन (1905): कर्जन द्वारा बंगाल को धार्मिक आधार पर विभाजित करने के फैसले ने उग्र राष्ट्रवाद को राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदल दिया।
नेताओं का उदय: लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) और अरविंद घोष ने जुझारू राजनीति का नेतृत्व किया।
स्वदेशी आंदोलन और वैचारिक बदलाव (Swदेशी Movement)
आत्मनिर्भरता पर बल: उग्र राष्ट्रवादियों ने केवल राजनीतिक सुधारों के बजाय आत्मनिर्भरता (आत्मशक्ति), राष्ट्रीय शिक्षा और स्वदेशी उद्योगों पर बल दिया।
तिलक का योगदान: लोकमान्य तिलक ने केसरी और मराठा अखबारों के जरिए जनता में वीरता और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का साहस भरा।
शिवाजी और गणपति उत्सव: तिलक ने महाराष्ट्र में पारंपरिक त्योहारों को राजनीतिक चेतना और युवाओं को एकजुट करने का माध्यम बनाया।
वंदे मातरम: बंकिम चंद्र का यह गीत स्वदेशी आंदोलन का मुख्य राष्ट्रीय नारा बना, जिसने देशवासियों में अभूतपूर्व देशभक्ति जगाई।
सूरत विभाजन (1907): आंदोलन की रणनीति को लेकर कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में नरम दल और गरम दल पूरी तरह अलग हो गए।
क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रथम चरण (First Phase of Revolutionary Activities)
बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन
क्रांतिकारी विचारधारा का उदय: ब्रिटिश दमन और आंदोलन के धीमे पड़ने से निराश युवाओं ने व्यक्तिगत वीरता और हिंसक प्रतिरोध का मार्ग चुना।
अनुशीलन समिति (1902): प्रमथनाथ मित्र, जतिंद्रनाथ बनर्जी और बारिंद्र कुमार घोष ने बंगाल के युवाओं को संगठित करने हेतु इसे स्थापित किया।
युगांतर पत्रिका (1906): बारिंद्र घोष और भूपेंद्रनाथ दत्त ने इस पत्रिका के माध्यम से खुलकर सशस्त्र क्रांति और सैन्य विद्रोह का प्रचार किया।
मुजफ्फरपुर बम कांड (1908): खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने क्रूर ब्रिटिश जज किंग्सफोर्ड की बग्गी पर मुजफ्फरपुर में बम फेंका था।
शहादत और आत्म बलिदान: पकड़े जाने पर प्रफुल्ल चाकी ने खुद को गोली मार ली और खुदीराम बोस को सबसे कम उम्र में फांसी दी गई।
अलीपुर षड्यंत्र केस: इस घटना के बाद पुलिस ने माणिकटोला बम फैक्ट्री पर छापा मारकर अरविंद घोष और बारिंद्र घोष सहित कई क्रांतिकारियों को पकड़ा।
अरविंद घोष का संन्यास: अलीपुर केस से बरी होने के बाद अरविंद घोष ने सक्रिय राजनीति छोड़कर पांडिचेरी में आध्यात्मिक जीवन अपना लिया।
बाघा जतिन (जतिंद्रनाथ मुखर्जी): इन्होंने ‘युगांतर’ को पुनर्जीवित किया और बालासोर (ओडिशा) के युद्ध में अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।
महाराष्ट्र और पंजाब में क्रांति
चापेकर बंधु (1897): दामोदर और बालकृष्ण चापेकर ने पुणे के अत्याचारी प्लेग कमिश्नर रैंड और लेफ्टिनेंट आयर्स्ट की गोली मारकर हत्या की।
मित्र मेला (1899): नासिक में विनायक दामोदर सावरकर (वी.डी. सावरकर) और उनके भाई गणेश सावरकर ने इस गुप्त संस्था की शुरुआत की।
अभिनव भारत (1904): सावरकर भाइयों ने मित्र मेला को ही ‘अभिनव भारत’ नामक एक बेहद प्रभावशाली गुप्त क्रांतिकारी संगठन में बदल दिया।
नासिक षड्यंत्र केस (1909): अभिनव भारत के सदस्य अनंत लक्ष्मण कान्हेरे ने नासिक के क्रूर जिला मजिस्ट्रेट जैक्सन की गोली मारकर हत्या कर दी।
पंजाब में सक्रियता: लाला लाजपत राय और अजीत सिंह (भगत सिंह के चाचा) ने ‘अंजुमन-ए-मोहिब्बान-ए-वतन’ संस्था बनाकर किसानों को संगठित किया।
विदेशों में क्रांतिकारी गतिविधियां
इंडिया होम रूल सोसाइटी (1905): श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन में इसकी स्थापना की और क्रांतिकारियों के लिए ‘इंडिया हाउस’ छात्रावास शुरू किया।
द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट: श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन से इस पत्रिका का संपादन कर ब्रिटिश साम्राज्य की औपनिवेशिक नीतियों का कड़ा विरोध किया।
कर्जन वायली की हत्या (1909): इंडिया हाउस से जुड़े मदनलाल ढींगरा ने लंदन में ब्रिटिश अधिकारी कर्जन वायली की गोली मारकर हत्या कर दी।
मैडम भीकाजी कामा: इन्होंने 1907 में स्टटगार्ट (जर्मनी) के अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में पहली बार भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया था।
दमन और मूल्यांकन
कठोर ब्रिटिश कानून: सरकार ने ‘राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम (1907)’ और ‘भारतीय प्रेस अधिनियम (1910)’ बनाकर राष्ट्रवादियों की आवाज को पूरी तरह कुचल दिया।
नेताओं का निर्वासन: ब्रिटिश सरकार ने बाल गंगाधर तिलक को राजद्रोह के आरोप में छह वर्ष के लिए मांडले जेल (म्यांमार) भेज दिया।
ऐतिहासिक महत्व: इस चरण के क्रांतिकारियों का मुख्य उद्देश्य देशवासियों के मन से ब्रिटिश सत्ता का डर निकालना और राष्ट्रीय गौरव जगाना था।
प्रथम विश्व युद्ध और राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया:
प्रथम विश्व युद्ध (1914): 1914 में यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ, जिसमें ब्रिटेन मित्र देशों (Allied Powers) का हिस्सा था।
ब्रिटिश साम्राज्य की घोषणा: अंग्रेजों ने भारतीय नेताओं की सहमति के बिना ही भारत को इस वैश्विक युद्ध में जबरन शामिल कर दिया था।
राष्ट्रवादियों की तीन प्रतिक्रियाएं: युद्ध को लेकर भारतीय राष्ट्रवादियों की प्रतिक्रिया मुख्य रूप से तीन अलग-अलग वैचारिक धाराओं में पूरी तरह बंटी हुई थी।
उदारवादियों का रुख: नरमपंथी नेताओं ने ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया, क्योंकि उन्हें लगा कि युद्ध के बाद अंग्रेज स्वशासन का अधिकार दे देंगे।
उग्रवादियों का समर्थन: तिलक सहित गरमपंथी नेताओं ने भी ब्रिटेन की मदद की, क्योंकि वे ब्रिटिश न्यायप्रियता से कुछ संवैधानिक सुधारों की उम्मीद कर रहे थे।
क्रांतिकारियों का दृष्टिकोण: क्रांतिकारियों ने इस युद्ध को ब्रिटिश साम्राज्य की कमजोरी माना और भारत को आजाद कराने का एक सुनहरा मौका समझा।
होम रूल लीग आंदोलन (1916): प्रथम विश्व युद्ध के दौरान देश में ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन (Home Rule) की मांग हेतु यह आंदोलन शुरू हुआ।
बाल गंगाधर तिलक की लीग: तिलक ने अप्रैल 1916 में बेलगाम में अपनी होम रूल लीग बनाई, जिसका प्रभाव महाराष्ट्र और मध्य प्रांतों में था।
एनी बेसेंट की लीग: सितंबर 1916 में एनी बेसेंट ने मद्रास में अपनी अखिल भारतीय होम रूल लीग स्थापित की, जिसका विस्तार पूरे देश में था।
आंदोलन के तरीके: दोनों लीगों ने जनसभाओं, पुस्तिकाओं और राजनीतिक शिक्षा के माध्यम से देश की जनता के बीच स्वशासन का प्रचार-प्रसार किया।
गदर आंदोलन (1913): लाला हरदयाल और सोहन सिंह भकना ने अमेरिका और कनाडा में ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए गदर पार्टी बनाई।
सैन्य विद्रोह की योजना: गदर क्रांतिकारियों ने विश्व युद्ध का लाभ उठाकर पंजाब में ब्रिटिश सेना के भीतर एक बड़े सशस्त्र विद्रोह की गुप्त योजना बनाई।
करतार सिंह सराभा: इस आंदोलन के सबसे युवा और जुझारू नेता करतार सिंह सराभा थे, जिन्होंने पंजाब में विद्रोह भड़काने के लिए प्राण न्यौछावर किए।
कामागाटामारू कांड (1914): कनाडाई सरकार द्वारा भारतीय प्रवासियों के जहाज को वापस भेजने की क्रूर घटना ने पंजाब में ब्रिटिश विरोधी भावनाएं भड़का दीं।
डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट (1915): अंग्रेजों ने गदर विद्रोह और क्रांतिकारी गतिविधियों को बेरहमी से कुचलने के लिए यह दमनकारी आपातकालीन कानून लागू किया था।
लखनऊ समझौता (1916): विश्व युद्ध के माहौल में कांग्रेस के दोनों धड़े (नरम-गरम दल) और मुस्लिम लीग आपस में ऐतिहासिक रूप से एकजुट हुए।
मॉन्टेग्यू घोषणा (1917): बढ़ते जन-दबाव के कारण ब्रिटिश भारत सचिव मॉन्टेग्यू ने भविष्य में क्रमिक रूप से जिम्मेदार सरकार (Responsible Government) देने का वादा किया।
घोषणा का वास्तविक उद्देश्य: इस ब्रिटिश घोषणा का मुख्य मकसद होम रूल आंदोलन को शांत करना और भारतीयों का युद्ध में सहयोग बनाए रखना था।
आर्थिक नुकसान: विश्व युद्ध के कारण भारत में भारी महंगाई, टैक्सों में बढ़ोतरी और आवश्यक वस्तुओं की तीव्र कमी से आम जनता त्रस्त थी।
गांधी जी का आगमन: इसी युद्ध के दौरान 1915 में महात्मा गांधी भारत लौटे, जिन्होंने आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की पूरी दिशा बदल दी।
गांधी जी और सविनय अवज्ञा आन्दोलन:
गांधी जी का आगमन और प्रारंभिक सत्याग्रह (Emergence of Gandhi)
भारत वापसी (1915): महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में सफल सत्याग्रह करने के बाद 9 जनवरी 1915 को स्थायी रूप से भारत वापस लौटे।
राजनैतिक गुरु: गांधी जी ने गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनैतिक गुरु बनाया और उनके कहने पर पहले वर्ष पूरे भारत का दौरा किया।
सत्याग्रह का सिद्धांत: गांधी जी के आंदोलन के दो मुख्य स्तंभ थे—’सत्य’ और ‘अहिंसा’, जिसके जरिए वे बिना हिंसा के न्याय मांगते थे।
चंपारण सत्याग्रह (1917): बिहार के चंपारण में गांधी जी ने नील की खेती की दमनकारी ‘तिनकठिया प्रणाली’ के खिलाफ पहला सफल सत्याग्रह किया।
अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918): सूती मिल मजदूरों के प्लेग बोनस विवाद को सुलझाने के लिए गांधी जी ने भारत में पहली बार भूख हड़ताल की।
खेड़ा सत्याग्रह (1918): गुजरात के खेड़ा में फसल बर्बाद होने पर भी कर वसूली के खिलाफ गांधी जी ने किसानों के लिए लगान-माफी आंदोलन चलाया।
रोलेट एक्ट (1919): ब्रिटिश सरकार ने बिना मुकदमा चलाए किसी को भी जेल भेजने का दमनकारी और काला ‘रोलेट कानून’ पारित किया।
रोलेट सत्याग्रह: गांधी जी ने इस काले कानून के विरोध में 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल और सत्याग्रह का आह्वान किया था।
जलियांवाला बाग हत्याकांड: 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल डायर ने शांतिपूर्ण जनसभा पर अंधाधुंध गोलियां चलवाकर नरसंहार किया।
हंटर कमिटी: इस बर्बर हत्याकांड की जांच के लिए अंग्रेजों ने हंटर कमीशन बनाया, जिसने डायर के अपराधों पर पर्दा डालने का प्रयास किया।
खिलाफत और असहयोग आंदोलन (Non-cooperation & Khilafat)
खिलाफत आंदोलन (1919): प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के खलीफा के पद और साम्राज्य को बचाने के लिए अली बंधुओं ने आंदोलन शुरू किया।
गांधी जी का समर्थन: हिंदू-मुस्लिम एकता के इस सुनहरे अवसर को देखकर गांधी जी अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी के अध्यक्ष बने।
असहयोग आंदोलन (1920): जलियांवाला बाग, रोलेट एक्ट और खिलाफत के मुद्दों पर कांग्रेस ने ऐतिहासिक असहयोग आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया।
आंदोलन के तरीके: सरकारी उपाधियों का त्याग, अदालतों, स्कूलों, विदेशी कपड़ों का पूरी तरह बहिष्कार और कर न देना इसके मुख्य तरीके थे।
तिलक स्वराज फंड: आंदोलन के वित्तीय प्रबंधन के लिए बाल गंगाधर तिलक की स्मृति में एक करोड़ रुपये से अधिक का फंड जुटाया गया।
अभूतपूर्व जन भागीदारी: इस आंदोलन में देश के किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं और व्यापारियों ने पहली बार इतनी बड़ी संख्या में भाग लिया।
चौरी-चौरा कांड (1922): 5 फरवरी 1922 को गोरखपुर के चौरी-चौरा में उग्र भीड़ ने एक थाने में आग लगाकर 22 पुलिसकर्मियों को जिंदा जला दिया।
आंदोलन की वापसी: हिंसा से दुखी होकर महात्मा गांधी ने 12 फरवरी 1922 को बारदोली बैठक में असहयोग आंदोलन तुरंत वापस ले लिया।
गांधी जी की गिरफ्तारी: असहयोग आंदोलन स्थगित होने के तुरंत बाद अंग्रेजों ने गांधी जी को राजद्रोह के आरोप में छह वर्ष की जेल की सजा सुनाई।
स्वराज्यवादियों का उदय (Emergence of Swarajists)
कांग्रेस में वैचारिक मतभेद: आंदोलन बंद होने के बाद कांग्रेस में आगे की रणनीति को लेकर दो वैचारिक गुट बन गए थे।
परिवर्तनवादी (Pro-Changers): सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू विधान परिषदों में प्रवेश कर सरकारी नीतियों का अंदर से विरोध करना चाहते थे।
अपरिवर्तनवादी (No-Changers): सी. राजगोपालाचारी और वल्लभभाई पटेल परिषदों के बहिष्कार और रचनात्मक कार्यों (खादी, शिक्षा) के पक्ष में थे।
स्वराज पार्टी की स्थापना (1923): गया अधिवेशन में असहमति के बाद चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने ‘कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी’ का गठन किया।
चुनावों में बड़ी सफलता: 1923 के केंद्रीय विधान परिषद चुनावों में स्वराज पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 42 सीटों पर जीत हासिल की।
विट्ठलभाई पटेल (1925): स्वराज पार्टी की सबसे बड़ी राजनैतिक सफलता विट्ठलभाई पटेल का केंद्रीय विधान परिषद का प्रथम भारतीय अध्यक्ष चुना जाना था।
पार्टी का कमजोर होना: 1925 में देशबंधु चितरंजन दास की असामयिक मृत्यु के बाद स्वराज पार्टी धीरे-धीरे कमजोर और बिखर गई।
समाजवादी विचारों का प्रसार (Rise of Socialist Ideas)
रूसी क्रांति का प्रभाव: 1917 की सोवियत संघ की साम्यवादी क्रांति से प्रेरित होकर भारतीय युवाओं में समाजवाद का तेजी से प्रसार हुआ।
वामपंथी नेताओं का उदय: जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस के भीतर समाजवादी और पूर्ण स्वतंत्रता के विचारों को मजबूती से उठाया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (1920): एम. एन. रॉय ने ताशकंद में सीपीआई (CPI) की स्थापना की, जिसने बाद में 1925 में कानपुर में अपना काम शुरू किया।
मजदूर और किसान संगठन: देश भर में ट्रेड यूनियनों और अखिल भारतीय किसान सभाओं का गठन हुआ, जिसने शोषित वर्ग की आवाज बुलंद की।
क्रूर ब्रिटिश दमन: अंग्रेजों ने बढ़ते वामपंथ को दबाने के लिए पेशावर, कानपुर और मेरठ षड्यंत्र केस चलाकर कम्युनिस्ट नेताओं को जेल भेजा।