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छत्रपति शिवाजी महाराज

छत्रपति शिवाजी महाराज (1630-1680 ईस्वी) भारतीय इतिहास के एक महान नायक, कुशल रणनीतिकार और दूरदर्शी शासक थे। उन्होंने दक्कन के सुल्तानों और शक्तिशाली मुगल साम्राज्य की नाक के नीचे स्वाभिमान और स्वतंत्रता के प्रतीक मराठा साम्राज्य‘ (हिन्दवी स्वराज्य) की स्थापना की।

प्रारंभिक जीवन और स्वराज्य की संकल्पना

  • जन्म और प्रेरणा: शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी दुर्ग (पुणे) में हुआ था। उनके पिता शाहजी भोंसले बीजापुर सल्तनत में एक शक्तिशाली सेनापति थे, जबकि उनकी माता जीजाबाई एक अत्यंत विदुषी और धार्मिक महिला थीं। जीजाबाई और उनके संरक्षक दादोजी कोंडदेव ने शिवाजी को रामायण, महाभारत और युद्ध कला की शिक्षा देकर बचपन से ही विदेशी शासकों की अधीनता के खिलाफ ‘स्वराज्य’ स्थापित करने की प्रेरणा दी।
  • किले जीतने की शुरुआत: मात्र 16 वर्ष की आयु में शिवाजी ने स्थानीय मावल साथियों को एकजुट कर बीजापुर के नियंत्रण वाले तोरणा किले पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने राजगढ़, कोंढाणा (सिंहगढ़) और पुरंदर जैसे कई महत्वपूर्ण किलों को जीतकर अपनी शक्ति का विस्तार शुरू किया।

बीजापुर से संघर्ष और अफजल खान का वध (1659)

  • शिवाजी महाराज की बढ़ती ताकत से घबराकर बीजापुर की बड़ी बेगम ने अपने सबसे खूंखार और बलशाली सेनापति अफजल खान को शिवाजी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए भेजा।
  • अफजल खान ने कपट से शिवाजी को मारने के उद्देश्य से उन्हें प्रतापगढ़ के जंगलों में मुलाकात के लिए आमंत्रित किया।
  • दूरदर्शी शिवाजी महाराज पहले से ही सतर्क थे और अपने कपड़ों के नीचे ‘चिल्खता’ (लोहे का कवच) और हाथों में बाघ नख‘ (Tiger Claws) छिपाकर गए थे।
  • जैसे ही अफजल खान ने गले मिलने के बहाने शिवाजी की गर्दन दबाकर कटार से हमला किया, शिवाजी ने अपने बाघ नख से अफजल खान का पेट फाड़कर उसका वध कर दिया। इस घटना ने शिवाजी को दक्कन का सबसे बड़ा नायक बना दिया।

मुगलों से पहला टकराव और शाइस्ता खान की फजीहत (1663)

  • जब मुगल सम्राट औरंगजेब को दक्षिण में शिवाजी महाराज की बढ़ती शक्ति का अहसास हुआ, तो उसने अपने मामा शहाइस्ता खान को एक विशाल सेना के साथ पुणे का सूबेदार बनाकर भेजा। शाइस्ता खान ने शिवाजी के लाल महल पर अधिकार कर लिया।
  • लाल महल पर सर्जिकल स्ट्राइक: अप्रैल 1663 की एक रात, शिवाजी महाराज ने अपने 400 वफादार सैनिकों के साथ एक बारात का भेष धरकर पुणे में प्रवेश किया और सीधे लाल महल पर अचानक धावा बोल दिया।
  • इस अप्रत्याशित हमले से घबराकर शाइस्ता खान ने खिड़की से कूदकर अपनी जान बचाई, लेकिन इस आपाधापी में उसकी अंगुलियां कट गईं। मुगलों की इस भारी फजीहत से नाराज होकर औरंगजेब ने शाइस्ता खान को बंगाल स्थानांतरित कर दिया।
  • सूरत की पहली लूट (1664): मुगलों को आर्थिक चोट पहुँचाने के लिए शिवाजी ने मुगलों के सबसे समृद्ध व्यापारिक केंद्र ‘सूरत’ पर आक्रमण किया और वहां से करोड़ों रुपये की संपत्ति अर्जित की, जिससे मराठा सेना को और मजबूती मिली।

पुरंदर की संधि और आगरा की जेल से पलायन (1665-1666)

  • शाइस्ता खान की विफलता के बाद औरंगजेब ने अपने सबसे चतुर सेनापति मिर्जा राजा जयसिंह को एक बहुत बड़ी सेना के साथ दक्षिण भेजा। जयसिंह ने कूटनीति से काम लेते हुए शिवाजी के कई किलों को घेर लिया।
  • पुरंदर की संधि (1665): परिस्थितियों को देखते हुए शिवाजी महाराज ने जून 1665 में जयसिंह के साथ संधि कर ली। इसके तहत शिवाजी को अपने 35 किलों में से 23 किले मुगलों को सौंपने पड़े और उनके पुत्र सम्भाजी को मुगल दरबार में 5000 का मनसबदार बनाया गया।
  • आगरा का नाटक (1666): राजा जयसिंह के आश्वासन पर शिवाजी महाराज मई 1666 में औरंगजेब के 50वें जन्मदिन के अवसर पर आगरा के मुगल दरबार पहुंचे। वहाँ उचित सम्मान न मिलने पर शिवाजी ने भरे दरबार में औरंगजेब का विरोध किया, जिससे नाराज होकर औरंगजेब ने उन्हें जयपुर भवन में नजरबंद (कैद) कर दिया।
  • चमत्कारी फरारी: औरंगजेब शिवाजी को जान से मारने की योजना बना रहा था, लेकिन अगस्त 1666 में शिवाजी महाराज ने बीमारी का बहाना बनाया और साधु-संतों व गरीबों में बांटे जाने वाले मिठाइयों और फलों के बड़े-बड़े टोकरों में छिपकर अपने पुत्र सम्भाजी के साथ मुगलों की कड़ी सुरक्षा से सुरक्षित भाग निकले। यह मुगलों के मुंह पर सबसे करारा तमाचा था।

छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक (1674)

  • आगरा से लौटने के बाद शिवाजी महाराज ने मुगलों को सौंपे गए सभी किलों को एक-एक करके दोबारा जीत लिया और 1670 में सूरत को दूसरी बार लूटा।
  • राज्याभिषेक: 6 जून 1674 को शिवाजी महाराज ने रायगढ़ के किले में विद्वान पंडित गागाभट्ट के माध्यम से अपना वैदिक अनुष्ठान के साथ राज्याभिषेक करवाया।
  • उन्होंने छत्रपति, ‘हैन्दव धर्मोद्धारक’ (हिंदू धर्म का रक्षक) और ‘क्षत्रिय कुलवंतस’ की उपाधियाँ धारण कीं। इस राज्याभिषेक ने मराठा स्वराज्य को एक संप्रभु और स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित कर दिया, जिसे अब मुगल या दक्कन के सुल्तान केवल ‘विद्रोही’ नहीं कह सकते थे।

शिवाजी महाराज की युद्ध नीति और प्रशासन

  • गनिमी कावा (Guerrilla Warfare): शिवाजी की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य उनकी ‘गोरिल्ला’ या ‘छापामार’ युद्ध नीति थी। सह्याद्रि की पहाड़ियों और घने जंगलों का लाभ उठाकर उनकी छोटी और फुर्तीली सेना मुगलों की भारी और सुस्त सेना पर अचानक हमला करती थी और उनके संभलने से पहले गायब हो जाती थी।
  • अष्टप्रधान परिषद: शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए उन्होंने आठ मंत्रियों की एक परिषद बनाई थी जिसे ‘अष्टप्रधान’ कहा जाता था, जिसमें ‘पेशवा’ (प्रधानमंत्री) का पद सर्वोच्च था।
  • भारतीय नौसेना के जनक (Father of Indian Navy): विदेशी शक्तियों (जंजीरा के सिद्दी, पुर्तगाली और अंग्रेज) से कोंकण तट की रक्षा करने के लिए शिवाजी महाराज ने भारत की पहली आधुनिक नौसेना (Navy) का गठन किया और सिंधुदुर्ग व विजयदुर्ग जैसे जल-दुर्गों (Sea Forts) का निर्माण कराया।
  • मृत्यु और विरासत: 3 अप्रैल 1680 को बीमारी के कारण रायगढ़ के किले में इस महान दूरदर्शी राजा का देहांत हो गया। लेकिन जो ‘स्वराज्य’ की लौ उन्होंने जलाई थी, उसने मुगलों को इतना कमजोर कर दिया कि औरंगजेब की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरा।

मराठा इतिहास

  • छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु (1680 ईस्वी) के बाद का मराठा इतिहास बेहद गौरवशाली और संघर्षपूर्ण रहा। यह इतिहास दो बड़े चरणों में बंटा हुआ है: पहला, शिवाजी महाराज के उत्तराधिकारियों के नेतृत्व में मुगलों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम, और दूसरा, पेशवाओं के अधीन मराठा साम्राज्य का अखिल भारतीय विस्तार।

छत्रपति शिवाजी महाराज के उत्तराधिकारी (1680–1707)

  • शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य एक बेहद कठिन दौर से गुजरा, क्योंकि मुगल सम्राट औरंगजेब स्वयं अपनी पूरी ताकत के साथ दक्कन (दक्षिण भारत) को नष्ट करने आ गया था।
  • छत्रपति सम्भाजी महाराज (1680–1689): शिवाजी महाराज के बड़े पुत्र सम्भाजी ने मुगलों और बीजापुर के खिलाफ बेहद आक्रामक नीति अपनाई। उन्होंने 9 वर्षों तक मुगलों के साथ लगातार युद्ध किए और एक भी युद्ध नहीं हारा। हालांकि, 1689 में मुगलों ने उन्हें धोखे से बंदी बना लिया। औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम स्वीकार करने को कहा, लेकिन धर्म और स्वराज्य के लिए उन्होंने इनकार कर दिया, जिसके बाद औरंगजेब ने अत्यंत क्रूरतापूर्वक उनकी हत्या कर दी। सम्भाजी महाराज के इस बलिदान ने पूरे मराठा राष्ट्र को मुगलों के खिलाफ एकजुट कर दिया।
  • छत्रपति राजाराम महाराज (1689–1700): सम्भाजी के बाद उनके छोटे भाई राजाराम गद्दी पर बैठे। मुगलों के डर से उन्होंने जिंजी के किले (तमिलनाडु) से शासन चलाया। उन्होंने मराठा सरदारों को स्वतंत्र रूप से मुगलों पर हमला करने और जीते गए क्षेत्रों पर अधिकार करने की छूट दी, जिससे मुगलों के खिलाफ ‘जन-युद्ध’ (People’s War) शुरू हो गया।
  • महारानी ताराबाई (1700–1707): राजाराम की मृत्यु के बाद उनकी वीर पत्नी महारानी ताराबाई ने अपने अल्पायु पुत्र (शिवाजी द्वितीय) के नाम पर मराठा साम्राज्य का नेतृत्व संभाला। ताराबाई ने अद्भुत सैन्य नेतृत्व का परिचय दिया और मुगलों को दक्कन में ही नहीं, बल्कि मालवा और गुजरात तक खदेड़ दिया।
  • शाहू जी का आगमन और पेशवा काल की शुरुआत (1707)
  • 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगलों ने सम्भाजी के पुत्र शाहू जी को अपनी कैद से मुक्त कर दिया ताकि मराठों में गृहयुद्ध छिड़ जाए। शाहू जी और महारानी ताराबाई के बीच सत्ता संघर्ष हुआ, जिसमें शाहू जी विजयी रहे।
  • शाहू जी ने शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपनी प्रशासनिक शक्तियाँ अपने अत्यंत योग्य और वफादार प्रधानमंत्री यानी पेशवा को सौंप दीं। यहाँ से मराठा इतिहास में ‘पेशवा काल’ की शुरुआत हुई और छत्रपति ‘सतारा’ के प्रधान बनकर रह गए, जबकि सत्ता का मुख्य केंद्र पुणे (पेशवा की राजधानी) बन गया।
  • पेशवाओं के अधीन मराठा साम्राज्य का स्वर्णिम विस्तार
  • मराठा साम्राज्य को भारत की सबसे बड़ी महाशक्ति बनाने का श्रेय तीन मुख्य पेशवाओं को जाता है:
  • पेशवा बालाजी विश्वनाथ (1713–1720) — साम्राज्य के नीति-निर्माता
  • इन्हें ‘द्वितीय मराठा साम्राज्य का संस्थापक’ भी कहा जाता है। उन्होंने बिखरे हुए मराठा सरदारों को एकजुट किया।
  • 1719 ईस्वी में उन्होंने मुगलों के साथ दिल्ली की संधि की, जिसे मराठा इतिहास का ‘मैग्नाकार्टा’ (अधिकार पत्र) कहा जाता है। इसके तहत मुगलों ने शाहू जी को स्वराज्य का वास्तविक शासक माना और दक्षिण के छह सूबों से ‘चौथ’ और ‘सरदेशमुखी’ (कर) वसूलने का अधिकार मराठों को दे दिया।

पेशवा बाजीराव प्रथम (1720–1740) — अजेय योद्धा

  • मात्र 20 वर्ष की आयु में पेशवा बने बाजीराव प्रथम (जिन पर बाजीराव मस्तानी फिल्म बनी है) मराठा इतिहास के सबसे महान और शक्तिशाली सेनापति सिद्ध हुए। उन्होंने कटक से अटक” तक मराठा पताका फहराने का सपना देखा।
  • उत्तर भारत की ओर विस्तार: उन्होंने कहा था, आओ, हम इस पुराने वृक्ष (मुगल साम्राज्य) के खोखले तने पर प्रहार करें, शाखाएं तो अपने आप गिर जाएंगी।”
  • सैन्य सफलताएं: उन्होंने हैदराबाद के निजाम को पालखेड़ के युद्ध (1728) में बुरी तरह पराजित किया। मालवा, गुजरात और बुंदेलखंड (महाराजा छत्रसाल की मदद करके) को जीतकर मराठा साम्राज्य में मिलाया।
  • दिल्ली पर धावा (1737): बाजीराव प्रथम मात्र 500 घुड़सवारों के साथ दिल्ली की छाती तक पहुँच गए थे, जिससे डरकर मुगल सम्राट दिल्ली छोड़कर भागने की तैयारी करने लगा था। उन्होंने अपने जीवन में 41 युद्ध लड़े और वे एक भी युद्ध नहीं हारे। उनकी छापामार युद्ध नीति (गनिमी कावा) शिवाजी महाराज के बाद सबसे श्रेष्ठ मानी जाती थी।

पेशवा बालाजी बाजीराव / नाना साहब (1740–1761) — चरम उत्कर्ष और त्रासदी

  • बाजीराव प्रथम के पुत्र नाना साहब के काल में मराठा साम्राज्य अपनी भौगोलिक सीमाओं के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच गया।
  • मराठा परिसंघ (Confederacy): इस समय मराठा साम्राज्य का विस्तार इतना बड़ा हो गया था कि इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए पांच बड़े मराठा घरानों का उदय हुआ:
    • पेशवा (पुणे)
    • सिंधिया / शंदे (ग्वालियर)
    • होल्कर (इंतौर)
    • गायकवाड़ (बड़ौदा)
    • भोंसले (नागपुर)
  • अटक तक विजय (1758): रघुनाथ राव के नेतृत्व में मराठा सेना ने आधुनिक पाकिस्तान के अटक किले पर विजय प्राप्त की और वहां मराठा ध्वज फहराया। इस समय बंगाल के नवाब से लेकर मैसूर के हैदर अली तक, सब मराठों को कर (चौथ) देते थे।

पानीपत का तृतीय युद्ध (1761) और मराठा साम्राज्य का पतन

  • मराठों की इस बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए अफगानिस्तान के शासक अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया।
  • 14 जनवरी 1761 को इतिहास का सबसे विनाशकारी पानीपत का तृतीय युद्ध मराठों (नेतृत्व: सदाशिवराव भाऊ) और अहमद शाह अब्दाली के बीच हुआ।
  • इस युद्ध में उत्तर भारत के किसी भी स्थानीय राजा (राजपूत या जाट) ने मराठों की कठोर कर नीति के कारण उनका साथ नहीं दिया, और मराठों की रसद (भोजन) आपूर्ति कट गई।
  • इस भीषण युद्ध में मराठों की करारी हार हुई और सदाशिवराव भाऊ, पेशवा के पुत्र विश्वासराव सहित मराठा सेना के हजारों वीर योद्धा मारे गए। इस हार के सदमे से पेशवा नाना साहब की भी मृत्यु हो गई।
  • महत्व: पानीपत के इस युद्ध ने यह तय नहीं किया कि भारत पर कौन शासन करेगा, बल्कि यह तय कर दिया कि भारत पर अब मराठे शासन नहीं कर पाएंगे। इस राजनीतिक शून्यता का लाभ उठाकर आगे चलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। हालांकि, बाद में पेशवा माधवराव प्रथम ने मराठा शक्ति को दोबारा पुनर्जीवित किया, लेकिन आंतरिक कलह और अंग्रेजों के साथ तीन युद्धों (आंग्ल-मराठा युद्ध) के बाद 1818 ईस्वी में मराठा साम्राज्य का पूरी तरह अंत हो गया।

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