बाबर और मुगल साम्राज्य की स्थापना
- ज़हीर-उद-दीन मुहम्मद ‘बाबर’ का जन्म 1483 ईस्वी में मध्य एशिया की फर्गना नामक छोटी रियासत में हुआ था।
- वह अपने पिता की ओर से तैमूर लंग और माता की ओर से क्रूर मंगोल विजेता चंगेज खान का वंशज था।
- पिता की मृत्यु के बाद मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में बाबर फर्गना की गद्दी पर बैठा, लेकिन उसे वहां भारी संघर्ष करना पड़ा।
- मध्य एशिया में समरकंद को जीतने की उसकी बार-बार की कोशिशें विफल रहीं, जिसके बाद उसने 1504 ईस्वी में काबुल पर अधिकार कर लिया।
- काबुल में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद बाबर ने 1507 ईस्वी में अपनी पैतृक उपाधि ‘मिर्जा’ को त्यागकर ‘पादशाह’ (या बादशाह) की उपाधि धारण की।
- मध्य एशिया में विफलता और धन की कमी के कारण बाबर ने समृद्ध भारत की ओर रुख करने का निश्चय किया।
- भारत पर वास्तविक आक्रमण से पहले बाबर ने सीमावर्ती क्षेत्रों पर कुल चार छोटे-छोटे शुरुआती हमले किए थे।
- दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के बढ़ते अत्याचारों से तंग आकर पंजाब के गवर्नर दौलत खान लोदी और राणा सांगा ने बाबर को भारत आने का निमंत्रण दिया।
- 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर का सामना दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी की विशाल सेना से हुआ।
- इस युद्ध में बाबर ने अपनी प्रसिद्ध ‘तुलगमा युद्ध पद्धति’ (सैन्य घेराबंदी) और तोपखाने का पहली बार बड़े पैमाने पर प्रयोग किया।
- कुशल रणनीतिक कौशल और तोपखाने के बल पर बाबर ने इब्राहिम लोदी को पराजित कर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी।
- पानीपत की जीत के बाद बाबर ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया, लेकिन भारत में उसकी सत्ता अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं थी।
- उसे उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली राजपूत राजा, मेवाड़ के महाराजा राणा सांगा से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा।
- 17 मार्च 1527 को खानवा के ऐतिहासिक युद्ध में बाबर और राणा सांगा की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
- अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए बाबर ने इस युद्ध को ‘जिहाद’ (धर्मयुद्ध) घोषित किया और जीत के बाद ‘गाजी’ की उपाधि ली।
- खानवा के युद्ध में राजपूतों को पराजित करने के बाद भारत में बाबर की स्थिति और मुगल साम्राज्य की जड़ें पूरी तरह मजबूत हो गईं।
- इसके बाद उसने 1528 ईस्वी में चंदेरी के युद्ध में मेदिनी राय को और 1529 ईस्वी में घाघरा के युद्ध में अफगान सेनाओं को पराजित किया।
- लगातार युद्धों और अत्यधिक परिश्रम के कारण बाबर का स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ा और 26 दिसंबर 1530 को आगरा में उसकी मृत्यु हो गई।
- बाबर को पहले आगरा के आरामबाग में दफनाया गया था, लेकिन बाद में उसकी इच्छानुसार उसके शव को काबुल ले जाकर दफनाया गया।
- बाबर एक कुशल सेनापति होने के साथ-साथ विद्वान भी था; उसने तुर्की भाषा में अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ (बाबरनामा) लिखी।
हुमायूं (Humayun)
- बाबर की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र नसीरुद्दीन मुहम्मद ‘हुमायूँ’ 1530 ईस्वी में 23 वर्ष की आयु में आगरा की गद्दी पर बैठा।
- ‘हुमायूँ’ शब्द का अर्थ ‘भाग्यशाली’ होता है, लेकिन इतिहास में वह मुगल वंश का सबसे अभागा शासक सिद्ध हुआ।
- गद्दी पर बैठते ही हुमायूँ को खाली खजाना, विद्रोही अफगान और अपने सगे भाइयों की महत्वाकांक्षाओं जैसी भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
- अपने पिता बाबर के अंतिम निर्देशों का पालन करते हुए हुमायूँ ने अपने साम्राज्य को अपने भाइयों (कामरान, अस्करी और हिन्दाल) में बांट दिया, जो उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी।
- हुमायूँ का पहला सैन्य अभियान 1531 ईस्वी में कालिंजर के किले पर हुआ, जहाँ के शासक प्रताप रुद्रदेव ने मुगलों की अधीनता स्वीकार की।
- वर्ष 1532 ईस्वी में दोहरिया के युद्ध में हुमायूँ ने अफगान सेनापति महमूद लोदी को बुरी तरह पराजित किया।
- इसके बाद उसने चुनार के मजबूत किले की घेराबंदी की, जहाँ उभरते हुए शक्तिशाली अफगान नेता शेर खान (शेरशाह सूरी) ने आत्मसमर्पण कर संधि कर ली।
- हुमायूँ ने दिल्ली में अपनी सत्ता और संस्कृति को मजबूत करने के लिए ‘दीनपनाह’ नामक एक नए नगर की स्थापना की थी।
- इसी दौरान पश्चिम में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने तेजी से अपनी शक्ति बढ़ाई और चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण कर दिया।
- हुमायूँ ने बहादुर शाह को पराजित कर गुजरात और मालवा पर अधिकार कर लिया, लेकिन वह लंबे समय तक इन क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में नहीं रख सका।
- उधर पूर्व में शेर खान ने बंगाल और बिहार में अपनी स्थिति मजबूत कर ली, जिससे हुमायूँ को दोबारा पूर्व की ओर कूच करना पड़ा।
- 1539 ईस्वी में बक्सर के पास ‘चौसा के युद्ध’ में शेर शाह सूरी ने अचानक आक्रमण कर हुमायूँ की सेना को करारी शिकस्त दी।
- इस युद्ध में अपनी जान बचाने के लिए हुमायूँ ने घोड़े सहित गंगा नदी में छलांग लगा दी, जहाँ निजाम नामक एक भिश्ती (पानी ढोने वाले) ने उसकी जान बचाई।
- अगले ही वर्ष, 1540 ईस्वी में ‘कन्नौज या बिलग्राम के युद्ध’ में शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को अंतिम रूप से पराजित कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया।
- कन्नौज की हार के बाद भारत में मुगल साम्राज्य अस्थाई रूप से समाप्त हो गया और हुमायूँ को अगले 15 वर्षों तक निर्वासित जीवन जीना पड़ा।
- इस कठिन निर्वासन काल के दौरान, 1542 ईस्वी में अमरकोट के राजा वीरसाल के महल में हुमायूँ के पुत्र और भावी महान सम्राट अकबर का जन्म हुआ।
- हुमायूँ ने फारस (इरान) के शाह तहमास्प से सैन्य सहायता प्राप्त की और धीरे-धीरे काबुल, कंधार तथा लाहौर पर पुनः अधिकार कर लिया।
- वर्ष 1555 ईस्वी में ‘सरहिंद के युद्ध’ में हुमायूँ ने सूरी वंश के शासक सिकंदर सूरी को पराजित कर दोबारा दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार कर लिया।
- दोबारा सुल्तान बनने के मात्र सात महीने बाद, जनवरी 1556 ईस्वी में दीनपनाह नगर के पुस्तकालय (शेर मंडल) की सीढ़ियों से फिसलकर गिरने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।
- इतिहासकार लेनपूल ने हुमायूँ पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि वह जीवन भर लड़खड़ाता रहा और लड़खड़ाते हुए ही अपनी जान दे दी।
शेरशाह सूरी
शेरशाह सूरी (1540-1545 ईस्वी) का शासनकाल मात्र 5 वर्ष का था, लेकिन उसने इतने बेहतरीन प्रशासनिक और आर्थिक सुधार किए कि आगे चलकर महान मुगल सम्राट अकबर ने भी उसी के ढांचे को अपनाया।
केंद्रीय एवं प्रांतीय प्रशासन
- केंद्रीकृत शासन: शेरशाह स्वयं शासन की धुरी था, लेकिन सहायता के लिए उसने चार मुख्य विभाग बनाए—दीवान-ए-वजारत (वित्त), दीवान-ए-आरिज (सेना), दीवान-ए-इन्शा (शाही पत्राचार), और दीवान-ए-रसालत (विदेश/धार्मिक मामले)।
- साम्राज्य का विभाजन: उसने पूरे साम्राज्य को ‘सरकार‘ (जिलों) में और सरकारों को ‘परगनों‘ (तालुका) में विभाजित किया।
- भ्रष्टाचार पर रोक: परगनों में शिकदार (सैन्य अधिकारी) और अमीन (राजस्व अधिकारी) एक-दूसरे पर नियंत्रण रखते थे, जिससे स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार कम हुआ।
भू-राजस्व एवं आर्थिक सुधार (सबसे महत्वपूर्ण)
- जमीन का वैज्ञानिक सर्वेक्षण: शेरशाह ने ‘सिकंदरी गज’ (32 अंगुल) का उपयोग करके पूरे साम्राज्य की खेती योग्य भूमि की पैमाइश (माप) करवाई।
- रैयतवाड़ी व्यवस्था: उसने बिचौलियों को हटाकर सीधे किसानों (रैयत) से संपर्क साधा। किसानों को ‘पट्टा‘ (भूमि का कानूनी अधिकार) दिया गया और बदले में उनसे ‘कबूलियत‘ (कर देने का वचन पत्र) लिखवाया गया।
- कर की दर: भूमि को उसकी उपजाऊ शक्ति के आधार पर तीन श्रेणियों (उत्तम, मध्यम, निकृष्ट) में बांटा गया। औसत पैदावार का भाग (33%) कर के रूप में तय किया गया, जिसे नकद या अनाज दोनों रूपों में दिया जा सकता था।
- अकबर पर प्रभाव: अकबर के दीवान राजा टोडरमल ने शेरशाह की इसी भू-राजस्व व्यवस्था को आधार बनाकर मुगलों की प्रसिद्ध ‘दहशाला प्रणाली’ तैयार की थी।
मुद्रा प्रणाली में ऐतिहासिक बदलाव
- रुपये की शुरुआत: शेरशाह ने धातु के सिक्कों में मिलावट खत्म की। उसने 178 ग्रेन का शुद्ध चांदी का सिक्का चलाया, जिसे ‘रुपया‘ कहा गया। यह आज की भारतीय मुद्रा का पूर्वज है।
- तांबे का दाम: उसने 380 ग्रेन का तांबे का सिक्का भी चलाया जिसे ‘दाम’ कहा जाता था। चांदी के रुपये और तांबे के दाम का अनुपात था।
बुनियादी ढांचा और व्यापार (Infrastructure)
- ग्रैंड ट्रंक रोड (सड़क-ए-आज़म): व्यापार और सेना की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए उसने सोनारगांव (बंगाल) से पेशावर (आधुनिक पाकिस्तान) तक प्रसिद्ध शाही सड़क का पुनर्निर्माण करवाया, जिसे आज GT Road कहा जाता है।
- सरायों का निर्माण: सड़कों के किनारे हर दो कोस (लगभग 6 किमी) पर करीब 1700 ‘सरायों’ (विश्राम गृहों) का निर्माण कराया, जहाँ हिंदुओं और मुसलमानों के रहने व भोजन की अलग-अलग व्यवस्था थी। ये सरायें डाक-चौकियों का काम भी करती थीं।
- व्यापारिक करों का सरलीकरण: उसने पूरे साम्राज्य में आंतरिक सीमा-शुल्क समाप्त कर दिया। व्यापारियों को केवल दो जगहों पर टैक्स देना पड़ता था—एक साम्राज्य में प्रवेश करते समय और दूसरा वस्तु की बिक्री के समय।
सैन्य और कानून-व्यवस्था सुधार
- अलाउद्दीन की नीति का नवीनीकरण: सेना में भ्रष्टाचार रोकने के लिए उसने सैनिकों का ‘हुलिया’ लिखने और घोड़ों को ‘दागने’ की प्रथा को सख्ती से दोबारा लागू किया।
- स्थानीय जिम्मेदारी का सिद्धांत: कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उसने नियम बनाया कि यदि किसी क्षेत्र में चोरी या डकैती होती है, तो वहां के स्थानीय अधिकारी (मुकद्दम या जमींदार) को ही चोर को पकड़ना होगा या पीड़ित के नुकसान की भरपाई करनी होगी। इस नियम से अपराध न्यूनतम हो गए।
- इतिहासकार की टिप्पणी: प्रसिद्ध इतिहासकार के. आर. कानूनगो के अनुसार, “शेरशाह राष्ट्र निर्माता नहीं था, लेकिन वह एक महान प्रशासनिक अन्वेषक (Innovator) और प्रबंधक था, जिसने अकबर के भावी साम्राज्य के लिए मार्ग प्रशस्त किया।”
अकबर (Akbar)
- जलाल-उद-दीन मुहम्मद ‘अकबर’ का जन्म 15 अक्टूबर 1542 ईस्वी को अमरकोट के राणा वीरसाल के महल में हुआ था।
- हुमायूँ की अचानक मृत्यु के बाद 1556 ईस्वी में मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में अकबर का राज्याभिषेक पंजाब के कलानौर नामक स्थान पर किया गया।
- कम उम्र होने के कारण हुमायूँ के वफादार सेनापति बैरम खान को अकबर का संरक्षक (Regent) नियुक्त किया गया था।
- 5 नवंबर 1556 को पानीपत के द्वितीय युद्ध में बैरम खान के नेतृत्व में अकबर की सेना ने अफगान सेनापति हेमू को पराजित किया।
- वर्ष 1560 ईस्वी में बैरम खान के संरक्षण से मुक्त होने के बाद अकबर ने शासन की बागडोर पूरी तरह अपने हाथों में ले ली।
- अकबर ने अपनी साम्राज्यवादी नीति के तहत मालवा, गोंडवाना, गुजरात, बिहार, बंगाल और काश्मीर जैसे बड़े क्षेत्रों को जीतकर मुगल साम्राज्य में मिलाया।
- 18 जून 1576 को प्रसिद्ध ‘हल्दीघाटी का युद्ध’ अकबर के सेनापति राजा मानसिंह और मेवाड़ के वीर महाराजा महाराणा प्रताप के बीच हुआ था।
- अकबर ने राजपूतों को अपना मित्र बनाने के लिए ‘राजपूत नीति’ अपनाई, जिसके तहत वैवाहिक संबंध और उच्च प्रशासनिक पद दिए गए।
- उसने बहुसंख्यक हिंदू जनता का दिल जीतने के लिए 1563 ईस्वी में ‘तीर्थयात्रा कर’ और 1564 ईस्वी में ‘जजिया कर’ को पूरी तरह समाप्त कर दिया।
- गुजरात विजय की स्मृति में अकबर ने अपनी नई राजधानी फतेहपुर सीकरी में विश्वप्रसिद्ध ‘बुलंद दरवाजा’ का निर्माण करवाया था।
- उसने फतेहपुर सीकरी में धार्मिक चर्चाओं के लिए 1575 ईस्वी में ‘इबादतखाना’ (Prarthana Bhawan) की स्थापना की।
- वर्ष 1579 ईस्वी में अकबर ने ‘महजरनामा’ (Infallibility Decree) जारी किया, जिसने उसे धार्मिक मामलों में सर्वोच्च निर्णायक बना दिया।
- सभी धर्मों के मूल सिद्धांतों को मिलाकर अकबर ने 1582 ईस्वी में एक नया सामाजिक-धार्मिक पंथ ‘दीन-ए-इलाही’ (तौहीद-ए-इलाही) शुरू किया।
- इस नए पंथ ‘दीन-ए-इलाही’ को स्वीकार करने वाला एकमात्र और पहला हिंदू राजा उसका चतुर दरबारी बीरबल था।
- प्रशासनिक सुदृढ़ता के लिए अकबर ने सैन्य और नागरिक व्यवस्था में ‘मनसबदारी प्रथा’ की शुरुआत की जो योग्यता पर आधारित थी।
- अकबर के दीवान राजा टोडरमल ने भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार करते हुए प्रसिद्ध ‘आईन-ए-दहशाला’ (जब्ती प्रणाली) लागू की।
- अकबर के दरबार में नौ प्रख्यात विद्वानों और कलाकारों की एक मंडली रहती थी, जिन्हें ‘नवरत्न’ (जैसे अबुल फजल, तानसेन, टोडरमल) कहा जाता था।
- उसके नवरत्न अबुल फजल ने अकबर के शासनकाल का विस्तृत इतिहास ‘अकबरनामा’ और ‘आईन-ए-अकबरी’ नामक ग्रंथों में लिखा।
- अक्टूबर 1605 ईस्वी में अतिसार (Dysentery) की गंभीर बीमारी के कारण सम्राट अकबर की मृत्यु हो गई।
- अकबर के शव को आगरा के पास सिकंदरा में दफनाया गया, जहाँ उसका भव्य और कलात्मक मकबरा आज भी स्थित है।
अकबर की नीतियां
- सम्राट अकबर ने अपनी दूरदर्शिता से एक ऐसी सुदृढ़ नीति अपनाई जिसने मुगल साम्राज्य को एक राष्ट्रीय साम्राज्य में बदल दिया।
- अकबर की धार्मिक नीति का मुख्य आधार ‘सुलह-ए-कुल’ था, जिसका अर्थ सार्वभौमिक शांति और सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता था।
- उसने बहुसंख्यक हिंदुओं का समर्थन पाने के लिए 1563 में तीर्थयात्रा कर और 1564 में जजिया कर को पूरी तरह समाप्त कर दिया।
- अकबर ने बलपूर्वक धर्म परिवर्तन कराने और युद्ध बंदियों को दास बनाने की कुप्रथाओं पर भी कड़ा प्रतिबंध लगाया।
- उसने विभिन्न धर्मों के दर्शन को समझने के लिए 1575 ईस्वी में फतेहपुर सीकरी में ‘इबादतखाना’ (प्रार्थना भवन) बनवाया।
- शुरुआत में इबादतखाना केवल इस्लाम के लिए था, लेकिन 1578 में इसे हिंदू, जैन, पारसी और ईसाई संतों के लिए भी खोल दिया गया।
- धार्मिक कट्टरपंथियों के प्रभाव को कम करने के लिए अकबर ने 1579 में ‘महजरनामा’ जारी कर स्वयं को धार्मिक मामलों का सर्वोच्च निर्णायक घोषित किया।
- वर्ष 1582 में उसने सभी धर्मों की अच्छी बातों को मिलाकर ‘दीन-ए-इलाही’ (दैवीय एकेश्वरवाद) नामक एक नए पंथ की शुरुआत की।
- प्रशासनिक क्षेत्र में अकबर ने साम्राज्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक केंद्रीकृत शासन व्यवस्था का निर्माण किया।
- प्रशासन में सुल्तान (सम्राट) सर्वोच्च सेनापति, मुख्य न्यायाधीश और कार्यपालिका का प्रधान होता था।
- सम्राट की सहायता के लिए वकील (प्रधानमंत्री), दीवान (वित्त मंत्री), मीर बख्शी (सैन्य प्रमुख) और सद्र-उस-सुदूर (धार्मिक प्रमुख) होते थे।
- अकबर ने पूरे साम्राज्य को ‘सूबों’ (प्रांतों) में विभाजित किया, जिनकी संख्या शुरुआत में 12 थी और बाद में बढ़कर 15 हो गई।
- प्रत्येक सूबे का प्रशासनिक प्रमुख ‘सिपहसालार’ या ‘सूबेदार’ होता था, जो कानून-व्यवस्था और सैन्य संचालन के लिए जिम्मेदार था।
- प्रांतीय स्तर पर वित्तीय नियंत्रण बनाए रखने के लिए केंद्र द्वारा ‘दीवान’ की नियुक्ति की जाती थी जो सूबेदार के प्रति जवाबदेह नहीं था।
- सूबों को आगे ‘सरकारों’ (जिलों) में और सरकारों को ‘परगनों’ (तालुका) में विभाजित किया गया था।
- सैन्य और प्रशासनिक सुदृढ़ता के लिए अकबर ने योग्यता पर आधारित ‘मनसबदारी व्यवस्था’ की शुरुआत की थी।
- इस व्यवस्था में प्रत्येक अधिकारी को एक ‘मनसब’ (पद) दिया जाता था, जो ‘जात’ (व्यक्तिगत पद) और ‘सवार’ (सैनिकों की संख्या) में बंटा था।
- राजस्व सुधारों के तहत राजा टोडरमल की सहायता से भू-राजस्व की वैज्ञानिक प्रणाली ‘आईन-ए-दहशाला’ (जब्ती प्रथा) लागू की गई।
- इस प्रणाली के तहत पिछले 10 वर्षों की पैदावार और कीमतों का औसत निकालकर $1/3$ भाग (33%) कर के रूप में तय किया गया था।
- इन उदार धार्मिक और कुशल प्रशासनिक नीतियों के कारण ही अकबर को इतिहास में ‘महान’ (Akbar the Great) की उपाधि मिली।
जहांगीर (Jahangir)
- अकबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र नूर-उद-दीन मुहम्मद ‘जहांगीर’ 1605 ईस्वी में आगरा की गद्दी पर बैठा।
- जहांगीर के बचपन का नाम ‘सलीम’ था, जो अकबर के पसंदीदा सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के नाम पर रखा गया था।
- गद्दी पर बैठते ही जहांगीर को अपने ही ज्येष्ठ पुत्र शहजादा खुसरो के भारी विद्रोह का सामना करना पड़ा।
- खुसरो की सहायता करने के कारण जहांगीर ने सिखों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव को मृत्युदंड दे दिया था।
- जहांगीर को इतिहास में उसके ‘न्याय की जंजीर’ (Chain of Justice) के लिए याद किया जाता है, जो आगरा के किले में लगी थी।
- सोने से बनी इस जंजीर में 60 घंटियाँ थीं, जिसे खींचकर कोई भी पीड़ित सीधे सम्राट से न्याय की गुहार लगा सकता था।
- गद्दी पर बैठते ही उसने लोक कल्याण के लिए 12 अध्यादेश (दस्तूर-उल-अमल) जारी किए, जिनमें मादक पदार्थों पर प्रतिबंध शामिल था।
- वर्ष 1611 ईस्वी में जहांगीर ने अली कुली बेग (शेर अफगन) की विधवा मेहरुन्निसा से विवाह किया।
- मेहरुन्निसा की सुंदरता और बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर जहांगीर ने उसे ‘नूरमहल’ और बाद में ‘नूरजहाँ’ (संसार की रोशनी) की उपाधि दी।
- शासन व्यवस्था पर नूरजहाँ का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि सिक्कों पर जहांगीर के साथ उसका नाम भी अंकित होने लगा।
- जहांगीर के काल की सबसे बड़ी सैन्य सफलता मेवाड़ के साथ लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष का अंत थी।
- वर्ष 1615 ईस्वी में राणा प्रताप के पुत्र राणा अमर सिंह ने मुगल शहजादे खुर्रम (शाहजहाँ) के माध्यम से मुगलों से संधि की।
- जहांगीर के शासनकाल को ‘मुगल चित्रकला का स्वर्ण युग’ (Golden Age of Mughal Painting) कहा जाता है।
- जहांगीर स्वयं चित्रकला का पारखी था; उसका दावा था कि वह किसी भी चित्र को देखकर उसके चित्रकार का नाम बता सकता है।
- उस्ताद मन्सूर (पक्षी विशेषज्ञ) और अबुल हसन उसके दरबार के दो सबसे प्रसिद्ध और महान चित्रकार थे।
- जहांगीर के शासनकाल में ही प्रथम ब्रिटिश दूत कैप्टन विलियम हॉकिन्स (1608) और सर थॉमस रो (1615) व्यापारिक रियायतें मांगने भारत आए थे।
- जहांगीर ने अंग्रेजों को सूरत में अपनी पहली व्यापारिक कोठी (फैक्ट्री) स्थापित करने की शाही अनुमति प्रदान की थी।
- वास्तुकला के क्षेत्र में उसके समय में सिकंदरा में अकबर का मकबरा और लाहौर में शालीमार बाग का निर्माण हुआ।
- वर्ष 1627 ईस्वी में कश्मीर से लौटते समय भीमवार नामक स्थान पर अत्यधिक शराब पीने और बीमारी के कारण जहांगीर की मृत्यु हो गई।
- जहांगीर को लाहौर (आधुनिक पाकिस्तान) के पास शहादरा में रावी नदी के तट पर दफनाया गया, जहाँ उसका भव्य मकबरा स्थित है।
शाहजहाँ (Shah Jahan)
- जहांगीर की मृत्यु और उत्तराधिकार के संघर्ष के बाद उसका पुत्र शहजादा खुर्रम 1628 ईस्वी में ‘शाहजहाँ’ के नाम से आगरा की गद्दी पर बैठा।
- शाहजहाँ का जन्म 1592 ईस्वी में लाहौर में मारवाड़ के राजा उदयसिंह की पुत्री जगत गोसाईं (जोधबाई) के गर्भ से हुआ था।
- गद्दी पर बैठते ही उसे बुंदेलखंड के राजा जुझार सिंह और दक्कन के अफगान सूबेदार खान-ए-जहाँ लोदी के विद्रोहों का सामना करना पड़ा।
- वर्ष 1612 ईस्वी में उसका विवाह आसफ खान की पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम से हुआ, जिन्हें बाद में ‘मुमताज महल’ की उपाधि दी गई।
- शाहजहाँ अपनी बेगम मुमताज महल से अत्यधिक प्रेम करता था, जिनकी मृत्यु 1631 ईस्वी में चौदहवें बच्चे के प्रसव के दौरान हुई।
- मुमताज महल की याद में शाहजहाँ ने आगरा में यमुना नदी के तट पर विश्वप्रसिद्ध संगमरमर के मकबरे ‘ताजमहल’ का निर्माण करवाया।
- शाहजहाँ के शासनकाल को ‘मुगल स्थापत्य कला का स्वर्ण युग’ (Golden Age of Mughal Architecture) कहा जाता है।
- उसने आगरा के किले में मोती मस्जिद, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास और मुसम्मन बुर्ज जैसी खूबसूरत इमारतों का निर्माण कराया।
- शाहजहाँ ने अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली स्थानांतरित करने के लिए दिल्ली में ‘शाहजहानाबाद’ नामक एक नए नगर की नींव रखी।
- दिल्ली में उसने भव्य ‘लाल किला’ बनवाया, जिसके भीतर कलात्मक नक्काशी से युक्त दीवान-ए-खास और रंग महल स्थित हैं।
- उसने लाल किले के दीवान-ए-खास में बैठने के लिए बहुमूल्य हीरे-जवाहरात से जड़ा ‘तख्त-ए-ताऊस’ (मयूर सिंहासन) बनवाया था।
- इसी मयूर सिंहासन में विश्वप्रसिद्ध ‘कोहिनूर हीरा’ जड़ा गया था, जिसे बाद में नादिर शाह लूटकर ईरान ले गया।
- शाहजहाँ ने दिल्ली में भारत की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक भव्य ‘जामा मस्जिद’ का निर्माण भी करवाया था।
- सैन्य दृष्टि से शाहजहाँ ने दक्कन में अहमदनगर को पूरी तरह मुगल साम्राज्य में मिला लिया और गोलकुंडा व बीजापुर से संधि की।
- मध्य एशिया में अपने पूर्वजों की भूमि समरकंद और बलख-बदख्शां को जीतने के उसके सैन्य अभियान भारी धन-जन की हानि के साथ विफल रहे।
- शाहजहाँ के चार पुत्रों (दारा शिकोह, शाहशुजा, औरंगजेब, मुराद) में दारा शिकोह सबसे विद्वान था, जिसने उपनिषदों का फारसी अनुवाद कराया।
- वर्ष 1657 ईस्वी में शाहजहाँ के गंभीर रूप से बीमार पड़ते ही उसके चारों पुत्रों के बीच गद्दी के लिए खूनी उत्तराधिकार का युद्ध शुरू हो गया।
- इस उत्तराधिकार के युद्ध में क्रूर और कूटनीतिज्ञ पुत्र औरंगजेब ने अपने भाइयों को हराकर सत्ता पर पूरी तरह अधिकार कर लिया।
- औरंगजेब ने 1658 ईस्वी में अपने बूढ़े पिता शाहजहाँ को आगरा के किले के मुसम्मन बुर्ज में कैद कर दिया।
- कैद में रहते हुए 8 वर्ष बाद 1666 ईस्वी में शाहजहाँ की मृत्यु हो गई और उन्हें ताजमहल में ही मुमताज की कब्र के पास दफनाया गया।
औरंगज़ेब (Aurangzeb)
- शाहजहाँ के बाद उसका छठा और सबसे महत्वाकांक्षी पुत्र मुही-उद-दीन मुहम्मद ‘औरंगजेब’ 1658 ईस्वी में दिल्ली की गद्दी पर बैठा।
- उसने ‘आलमगीर’ (विश्व विजेता) की उपाधि धारण की और वह एकमात्र मुगल सम्राट था जिसका दो बार राज्याभिषेक हुआ था।
- औरंगजेब के शासनकाल में मुगल साम्राज्य अपनी भौगोलिक सीमाओं के चरम बिंदु पर पहुँचा, जो काबुल से लेकर तमिलनाडू तक फैला था।
- वह व्यक्तिगत जीवन में अत्यधिक सादगी पसंद और धार्मिक रूप से कट्टर था, जिसके कारण उसे ‘जिंदा पीर’ (Living Saint) कहा जाता था।
- उसने अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीति को पूरी तरह पलट दिया और 1679 ईस्वी में हिंदुओं पर दोबारा ‘जजिया कर’ लगा दिया।
- औरंगजेब ने अपने शासनकाल में नए हिंदू मंदिरों के निर्माण पर रोक लगा दी और काशी व मथुरा जैसे कई प्रसिद्ध मंदिरों को तुड़वाया।
- उसने दरबार में संगीत, चित्रकला, भांग की खेती, जुआ खेलने और झरोखा दर्शन जैसी प्रथाओं पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था।
- औरंगजेब की इस अनुदार धार्मिक नीति के कारण उसे जाट, बुंदेला, सतनामी और सिखों के भीषण विद्रोहों का सामना करना पड़ा।
- सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर द्वारा इस्लाम स्वीकार न करने पर औरंगजेब ने 1675 ईस्वी में दिल्ली के चांदनी चौक पर उनकी हत्या करवा दी।
- राजपूतों के साथ मारवाड़ के उत्तराधिकार विवाद को लेकर उसका लंबा संघर्ष चला, जिससे मुगलों को राजपूतों का वफादार समर्थन खोना पड़ा।
- दक्षिण भारत में औरंगजेब को मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज से सबसे कड़ी और ऐतिहासिक चुनौती मिली।
- वर्ष 1665 ईस्वी में औरंगजेब के सेनापति राजा जयसिंह और शिवाजी महाराज के बीच प्रसिद्ध ‘पुरंदर की संधि’ हुई थी।
- औरंगजेब ने चालाकी से शिवाजी महाराज को आगरा बुलाकर कैद कर लिया था, लेकिन शिवाजी सूझबूझ से फलों की टोकरी में छिपकर भाग निकले।
- शिवाजी की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने उनके पुत्र शम्भाजी को बंदी बना लिया और 1689 ईस्वी में अत्यंत क्रूरतापूर्वक उनकी हत्या कर दी।
- अपने जीवन के अंतिम 25 वर्ष औरंगजेब ने दक्षिण भारत (दक्कन) के सैन्य अभियानों में बिताए, जहाँ उसने बीजापुर (1686) और गोलकुंडा (1687) को जीता।
- लगातार मराठा छापामार युद्ध के कारण दक्षिण भारत औरंगजेब के लिए एक नासूर (Ulcer) सिद्ध हुआ, जिसने मुगल खजाने और सेना को पूरी तरह तबाह कर दिया।
- वास्तुकला के क्षेत्र में उसने अपनी पत्नी की याद में औरंगाबाद में ‘बीबी का मकबरा’ बनवाया, जिसे ‘ताजमहल की फुहड़ नकल’ कहा जाता है।
- उसने दिल्ली के लाल किले के भीतर अपने निजी उपयोग के लिए संगमरमर की खूबसूरत ‘मोती मस्जिद’ का निर्माण भी करवाया था।
- अंततः, लगातार युद्धों से थके और बीमार औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च 1707 ईस्वी को अहमदनगर (महाराष्ट्र) में हो गई।
- औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही केंद्रीय मुगल सत्ता पूरी तरह कमजोर हो गई और भारत में शक्तिशाली उत्तर-मुगल काल (पतन का दौर) शुरू हुआ।