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भक्ति और सूफी आंदोलन

  • मध्यकाल में भारत के सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में दो महान सुधार आंदोलनों का उदय हुआ, जिन्हें भक्ति और सूफी आंदोलन कहा जाता है।
  • इन दोनों आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों, धार्मिक कट्टरता और भेदभाव को दूर कर आपसी भाईचारे को बढ़ावा देना था।
  • भक्ति आंदोलन की शुरुआत सबसे पहले सातवीं शताब्दी के आसपास दक्षिण भारत में तमिल क्षेत्र से हुई थी।
  • दक्षिण भारत में इस आंदोलन का नेतृत्व ‘नयनार’ (शिव भक्त) और ‘अलवार’ (विष्णु भक्त) संतों ने किया था।
  • दक्षिण भारत से भक्ति आंदोलन को उत्तर भारत में लाने का श्रेय महान संत रामानंद को जाता है।
  • उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन मुख्य रूप से दो धाराओं—सगुण (साकार ईश्वर की पूजा) और निर्गुण (निराकार ईश्वर की पूजा) में विभाजित हो गया।
  • निर्गुण धारा के प्रमुख संत कबीरदास और गुरु नानक देव थे, जिन्होंने मूर्ति पूजा, जाति-पांत और बाहरी आडंबरों का कड़ा विरोध किया।
  • सगुण धारा के प्रमुख संतों में तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई और चैतन्य महाप्रभु शामिल थे, जिन्होंने ईश्वर के मानवीय रूपों की भक्ति पर बल दिया।
  • भक्ति संतों ने संस्कृत के बजाय आम बोलचाल की क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग किया, जिससे स्थानीय साहित्य का बहुत विकास हुआ।
  • इसी काल में इस्लाम धर्म के भीतर भी एक उदार और रहस्यवादी आंदोलन का जन्म हुआ, जिसे ‘सूफी आंदोलन’ कहा जाता है।
  • ‘सूफी’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘सूफ़’ (ऊन) से मानी जाती है, क्योंकि ये संत मोटे ऊनी वस्त्र पहनकर सादा जीवन जीते थे।
  • सूफी आंदोलन का मुख्य उद्देश्य ईश्वर के प्रति बिना शर्त प्रेम, मानवता की सेवा और संगीत के माध्यम से आध्यात्मिक शांति प्राप्त करना था।
  • सूफी संतों के रहने के स्थान और उनके वैचारिक केंद्रों को ‘खानकाह’ कहा जाता था।
  • सूफी संत अलग-अलग धार्मिक संप्रदायों में संगठित थे, जिन्हें ‘सिलसिला’ (जैसे चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरी और नक्शबंदी) कहा जाता है।
  • भारत में सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली ‘चिश्ती सिलसिला’ था, जिसकी स्थापना ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर में की थी।
  • चिश्ती सिलसिले के अन्य महान संतों में हजरत निजामुद्दीन औलिया और बाबा फरीद शामिल थे, जिन्होंने जनमानस को बहुत प्रभावित किया।
  • सूफी संत ईश्वर की आराधना के लिए संगीत और आध्यात्मिक गीतों का सहारा लेते थे, जिसे ‘समा’ (कव्वाली) कहा जाता था।
  • इन आंदोलनों ने जाति प्रथा, छुआछूत और ऊंच-नीच के सामाजिक भेदभाव पर कड़ा प्रहार किया और सभी को समान माना।
  • भक्ति और सूफी संतों के प्रयासों से हिंदू और मुस्लिम संस्कृतियों के बीच समन्वय बढ़ा, जिससे देश में ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का विकास हुआ।
  • अंततः, इन सुधारवादी आंदोलनों ने भारतीय समाज को अधिक सहिष्णु, मानवीय और उदार बनाने में युगांतरकारी भूमिका निभाई।

क्षेत्रीय साहित्य और कला

  • मध्यकालीन भारत में मुगल साम्राज्य के अलावा विभिन्न क्षेत्रीय राज्यों के उदय से स्थानीय भाषाओं, साहित्य और कला शैलियों का अभूतपूर्व विकास हुआ।
  • भक्ति आंदोलन के प्रभाव और क्षेत्रीय शासकों के संरक्षण के कारण इस काल में स्थानीय भाषाओं में विपुल साहित्य रचा गया।
  • हिंदी साहित्य के इतिहास में 14वीं से 17वीं शताब्दी के ‘भक्ति काल’ को इसका ‘स्वर्ण युग’ माना जाता है।
  • इस युग में संत सूरदास ने ब्रजभाषा में कृष्ण भक्ति पर आधारित ‘सूरसागर’, ‘सूर सारावली’ और ‘साहित्य लहरी’ की रचना की।
  • महाकवि तुलसीदास ने जनसामान्य की अवधी भाषा में भगवान राम के चरित्र पर आधारित कालजयी ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ लिखा।
  • संत कबीरदास ने अपनी सधुक्कड़ी भाषा में निर्गुण भक्ति और सामाजिक सुधार पर आधारित ‘बीजक’ (साखी, सबद, रमैनी) की रचना की।
  • कृष्णभक्त मीराबाई ने राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा में मधुर भजनों (पदावली) की रचना की, जबकि रसखान ने भी ब्रजभाषा में कृष्ण लीलाएं लिखीं।
  • हिंदी के ‘रीति काल’ (17वीं-19वीं शताब्दी) में श्रृंगार रस पर जोर रहा, जिसके प्रमुख कवियों में केशवदास, बिहारी और भूषण शामिल थे।
  • बंगाली साहित्य में संत चैतन्य महाप्रभु के आंदोलन का गहरा प्रभाव रहा और कृत्तिवास ओझा ने प्रसिद्ध ‘कृत्तिवासी रामायण’ की रचना की।
  • मराठी साहित्य को वारकरी संप्रदाय के संतों ने समृद्ध किया, जिसमें संत ज्ञानेश्वर ने भगवद गीता पर ‘ज्ञानेश्वरी’ नामक प्रसिद्ध टीका लिखी।
  • महाराष्ट्र के अन्य महान संतों जैसे नामदेव, एकनाथ और तुकाराम ने ‘अभंगों’ (भजनों) के माध्यम से मराठी साहित्य को नई ऊंचाइयां दीं।
  • पंजाबी साहित्य का मुख्य आधार गुरु नानक देव और अन्य सिख गुरुओं के उपदेश बने, जिन्हें पवित्र ग्रंथ ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संकलित किया गया।
  • सूफी संत बाबा फरीद के रचे गए प्रसिद्ध छंदों को भी सम्मानपूर्वक सिखों के पवित्र ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में स्थान दिया गया।
  • गुजराती साहित्य में कृष्ण भक्ति के प्रसिद्ध कवि नरसी मेहता और ‘अख्यान’ (कथात्मक कविताओं) के लिए विख्यात प्रेमानंद का प्रमुख योगदान रहा।
  • असमिया साहित्य के विकास में असम के महान वैष्णव संत शंकरदेव का योगदान अतुलनीय रहा, जिन्होंने स्थानीय भाषा को बढ़ावा दिया।
  • दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य के तहत तेलुगु साहित्य का अभूतपूर्व विकास हुआ, जिसे सम्राट कृष्णदेव राय के ‘अष्टदिग्गज’ कवियों ने संवारा।
  • क्षेत्रीय राज्यों ने साहित्य के साथ-साथ संगीत और चित्रकला जैसी विविध ललित कला शैलियों को भी संरक्षण प्रदान किया।
  • इसी दौर में शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत का अनूठा मेल हुआ, जिससे अलग-अलग क्षेत्रों में संगीत के नए ‘घराने’ अस्तित्व में आए।
  • चित्रकला के क्षेत्र में मुगलों के प्रभाव और स्थानीय पुट से राजस्थानी, पहाड़ी (कांगड़ा/बसोहली) और दक्कनी चित्रकला शैलियों का जन्म हुआ।
  • अंततः, इन विविध क्षेत्रीय विकासों ने भारतीय संस्कृति को बहुआयामी, समृद्ध और विविधता से परिपूर्ण बनाने में युगांतरकारी भूमिका निभाई।

इंडो-इस्लामिक वास्तुकला

  • भारत में मुस्लिम शासकों के आगमन के साथ वास्तुकला की एक नई शैली विकसित हुई, जिसे इंडो-इस्लामिक वास्तुकला कहा जाता है।
  • यह शैली भारतीय (हिंदू-जैन-बौद्ध) और इस्लामी (ईरानी-मध्य एशियाई) वास्तुकला परंपराओं का एक सुंदर सम्मिश्रण है।
  • इस्लामी वास्तुकला में मुख्य रूप से मेहराब (Arches), गुंबद (Domes) और मीनारों का प्रयोग प्रमुखता से किया गया।
  • भारतीय वास्तुकला की पारंपरिक ‘शतीर पद्धति’ (Trabeate) के स्थान पर मुस्लिमों ने ‘चाप पद्धति’ (Arcuate) का प्रयोग शुरू किया।
  • इस शैली की इमारतों में सजावट के लिए मानव या पशु आकृतियों के बजाय ज्यामितीय आकृतियों और अरबी लिपि (कैलिग्राफी) का उपयोग हुआ।
  • सजावट की एक विशेष तकनीक ‘अरबस्क’ (Arabesque) का प्रयोग किया गया, जिसमें फूलों और लताओं के जटिल बेल-बूटे बनाए जाते थे।
  • दिल्ली सल्तनत के दौरान कुतुबुद्दीन ऐबक ने ‘कुव्वत-उल-इस्लाम’ मस्जिद और ‘अढाई दिन का झोपड़ा’ बनवाकर इस शैली की नींव रखी।
  • कुतुब मीनार इस काल की वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण है, जिसे ऐबक ने शुरू किया और इल्तुतमिश ने पूरा करवाया।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने ‘अलाई दरवाजा’ बनवाया, जिसमें पहली बार वैज्ञानिक तरीके से निर्मित मेहराब और गुंबद का प्रयोग हुआ।
  • तुगलक काल में इमारतों में मजबूती पर जोर दिया गया और ढलवां दीवारों (सलामी शैली) का प्रयोग हुआ, जैसे गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा।
  • लोदी वंश के दौरान ‘अष्टकोणीय मकबरे’ और ‘दोहरे गुंबद’ (Double Dome) की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर मुगलों के लिए प्रेरणा बने।
  • मुगल काल में इंडो-इस्लामिक वास्तुकला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची, जहाँ लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ।
  • हुमायूं का मकबरा मुगल वास्तुकला की पहली भव्य इमारत थी, जिसे ‘ताजमहल का पूर्वगामी’ (Precursor) माना जाता है।
  • अकबर ने फतेहपुर सीकरी का निर्माण करवाया, जिसमें बुलंद दरवाजा और पंच महल जैसे भारतीय और फारसी शैली के मिश्रित नमूने मिलते हैं।
  • जहांगीर के समय में ‘इत्माद-उद-दौला’ का मकबरा बना, जिसमें पहली बार कीमती पत्थरों की जड़ाई वाली ‘पितरा ड्यूरा’ (Pietra Dura) तकनीक का प्रयोग हुआ।
  • शाहजहाँ के शासनकाल को ‘मुगल वास्तुकला का स्वर्ण युग’ कहा जाता है, जिसने विश्वप्रसिद्ध ताजमहल और दिल्ली के लाल किले का निर्माण करवाया।
  • इंडो-इस्लामिक वास्तुकला में ‘चारबाग शैली’ के बगीचे और पानी के फव्वारों का उपयोग इमारतों की सुंदरता बढ़ाने के लिए किया जाता था।
  • प्रांतीय स्तर पर भी गुजरात, जौनपुर, मालवा और दक्कन (बीजापुर-गोलकुंडा) में इस शैली के अनूठे क्षेत्रीय रूप देखने को मिलते हैं।
  • बीजापुर का ‘गोल गुंबद’ अपने विशाल आकार और ध्वनि प्रतिध्वनि (Whispering Gallery) के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।
  • अंततः, इंडो-इस्लामिक वास्तुकला ने भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य को ताजमहल और कुतुब मीनार जैसी विश्व धरोहरें प्रदान कीं।

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