हर्षवर्धन के साम्राज्य के पतन के बाद भारत में फैली राजनीतिक अस्थिरता के बीच अरबों ने भारत की ओर रुख किया।
अरबों के आक्रमण का मुख्य उद्देश्य इस्लाम धर्म का प्रचार करना और भारत की अपार धन-संपत्ति को प्राप्त करना था।
भारत पर पहला सफल मुस्लिम आक्रमण 8वीं शताब्दी की शुरुआत में 712 ईस्वी में हुआ था।
इस ऐतिहासिक सैन्य अभियान का नेतृत्व एक युवा अरब सेनापति मोहम्मद बिन कासिम ने किया था।
कासिम को इराक के प्रांतीय गवर्नर अल-हज्जाज और दमिश्क के उमय्यद खलीफा अल-वलीद प्रथम ने भेजा था।
आक्रमण का तात्कालिक कारण देबल बंदरगाह के पास समुद्री डाकुओं द्वारा अरब जहाजों को लूटना था।
जब सिंध के राजा दाहिर ने डाकुओं पर कार्रवाई करने या हर्जाना देने से मना किया, तो खलीफा ने युद्ध की अनुमति दी।
मोहम्मद बिन कासिम ने सबसे पहले सिंध के तटीय शहर देबल (आधुनिक कराची के पास) पर हमला कर उसे जीता।
देबल के बाद अरब सेना ने निरुन नामक स्थान की ओर कूच किया, जहाँ बौद्ध नागरिकों ने बिना लड़े आत्मसमर्पण कर दिया।
20 जून 712 ईस्वी को मोहम्मद बिन कासिम और राजा दाहिर के बीच रावर का भयंकर और निर्णायक युद्ध हुआ।
राजा दाहिर ने इस युद्ध में अभूतपूर्व वीरता दिखाई, लेकिन अंततः वे युद्ध मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए।
राजा दाहिर की मृत्यु के बाद उनकी रानी रानीबाई ने रावर के किले की रक्षा की और अंत में अन्य महिलाओं के साथ ‘जौहर’ किया।
सिंध पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने के बाद मोहम्मद बिन कासिम ने उत्तर की ओर बढ़कर मुल्तान पर आक्रमण किया।
713 ईस्वी में मुल्तान पर अरबों का अधिकार हो गया, जहाँ से उन्हें इतना सोना मिला कि उन्होंने इसे ‘सोने का शहर’ नाम दिया।
इस पूरे आक्रमण और सिंध की तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक स्थिति का सबसे प्रामाणिक विवरण ‘चचनामा’ नामक ग्रंथ में मिलता है।
आंतरिक विश्वासघात, स्थानीय बौद्धों का असहयोग और राजपूत राजाओं में एकता की कमी अरबों की सफलता के प्रमुख कारण थे।
सिंध और मुल्तान जीतने के बाद भी अरब आक्रमणकारी भारत के आंतरिक हिस्सों (जैसे राजस्थान, गुजरात और मालवा) में आगे नहीं बढ़ सके।
प्रतिहार राजा नागभट्ट प्रथम और चालुक्य शासक पुलकेशी जैसे वीर भारतीय राजाओं ने अरबों को आगे बढ़ने से मजबूती से रोक दिया।
इस आक्रमण के सांस्कृतिक प्रभाव के रूप में भारतीयों के खगोल विज्ञान, गणित (शून्य और दशमलव) और चिकित्सा का ज्ञान अरबों के माध्यम से यूरोप पहुँचा।
यद्यपि अरब आक्रमण का भारत पर राजनीतिक प्रभाव सीमित रहा, लेकिन इसने भविष्य के तुर्क आक्रमणों (गजनवी और गोरी) के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया।
तुर्क आक्रमण
भारत पर मुस्लिम आक्रमणों की दूसरी और अधिक निर्णायक लहर तुर्कों द्वारा शुरू हुई, जो 10वीं शताब्दी के अंत से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक चली।
अरब आक्रमणों के विपरीत, तुर्क आक्रमणों का उद्देश्य केवल लूटपाट करना नहीं बल्कि भारत में स्थायी मुस्लिम शासन स्थापित करना भी था।
इन आक्रमणों के प्रमुख कारणों में इस्लाम का प्रसार, जिहाद की भावना, भारत की अकूत धन-संपत्ति को लूटना और राजनीतिक विस्तार शामिल था।
तत्कालीन भारत में राजनीतिक एकता का अभाव और छोटे राजपूत राज्यों के आपसी संघर्ष ने तुर्कों की सफलता का मार्ग आसान किया।
महमूद गजनवी (998-1030 ईस्वी) भारत पर आक्रमण करने वाला पहला प्रमुख तुर्क शासक था, जो गजनी (अफगानिस्तान) का रहने वाला था।
महमूद गजनवी का मुख्य उद्देश्य भारत की धन-संपत्ति को लूटना था, इसलिए उसने भारत पर कुल 17 बार आक्रमण किए।
उसने अपने पहले आक्रमण (1000-1001 ईस्वी) में सीमावर्ती क्षेत्रों के हिंदूशाही शासक जयपाल को पराजित किया था।
1025-1026 ईस्वी में गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर पर किया गया आक्रमण महमूद गजनवी का सबसे विनाशकारी और प्रसिद्ध आक्रमण था।
सोमनाथ आक्रमण के समय वहाँ का शासक चालुक्य वंश का भीमदेव प्रथम था और महमूद ने मंदिर से भारी मात्रा में सोना-चांदी लूटा।
महमूद गजनवी के दरबार में अल-बरूनी (‘किताब-उल-हिंद’ के लेखक) और फिरदौसी (‘शाहनामा’ के लेखक) जैसे महान विद्वान निवास करते थे।
गजनवी के विपरीत, गोर (अफगानिस्तान) वंश के मुहम्मद गोरी का मुख्य उद्देश्य भारत में स्थायी मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना करना था।
मुहम्मद गोरी ने 1175 ईस्वी में मुल्तान पर अपना पहला सफल आक्रमण किया और उसे जीत लिया।
1178 ईस्वी में गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय ने आबू पर्वत के पास मुहम्मद गोरी को भारत में उसकी पहली बड़ी शिकस्त दी।
1191 ईस्वी में तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) ने मुहम्मद गोरी को बुरी तरह पराजित किया और उसे भागने पर मजबूर कर दिया।
1192 ईस्वी में तराइन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गोरी ने रणनीति बदलकर पृथ्वीराज चौहान को निर्णायक रूप से पराजित किया और बंदी बना लिया।
तराइन का दूसरा युद्ध भारतीय इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने भारत में तुर्की शासन की स्थापना का द्वार खोल दिया।
1194 ईस्वी में चंदावर के युद्ध में गोरी ने कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद को पराजित कर मार डाला और कन्नौज पर अधिकार कर लिया।
1206 ईस्वी में सिंधु नदी के किनारे खोखरों द्वारा मुहम्मद गोरी की हत्या कर दी गई, जिसके बाद उसके भारतीय विजित प्रदेशों की कमान उसके सेनापतियों के हाथ में आ गई।
गोरी की मृत्यु के बाद उसके प्रमुख दास और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत और गुलाम वंश की स्थापना की।
अंततः, इन तुर्क आक्रमणों ने उत्तर भारत में राजपूत शक्ति का अंत किया और भारत में एक नई ‘इंडो-इस्लामिक’ संस्कृति के विकास की शुरुआत की।
दिल्ली सल्तनत
गुलाम वंश
मुहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद उसके गुलाम सेनापतियों ने भारतीय प्रदेशों पर नियंत्रण कर दिल्ली सल्तनत की नींव रखी।
दिल्ली सल्तनत का पहला राजवंश गुलाम वंश (मामलूक वंश) था, जिसने 1206 से 1290 ईस्वी तक शासन किया।
‘मामलूक’ एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ ‘स्वतंत्र माता-पिता से उत्पन्न दास’ होता है।
इस वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210 ई.) था, जो मुहम्मद गोरी का प्रतिभाशाली गुलाम सेनापति था।
ऐबक ने कभी ‘सुल्तान’ की उपाधि धारण नहीं की और उसने अपनी राजधानी लाहौर में स्थापित की थी।
ऐबक ने दिल्ली में कुव्वत-उल-इस्लाम और अजमेर में अढाई दिन का झोपड़ा मस्जिद का निर्माण करवाया।
उसने सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की याद में कुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया था।
अपनी अत्यधिक उदारता के कारण कुतुबुद्दीन ऐबक को इतिहास में ‘लाखबख्श’ (लाखों का दाता) कहा जाता था।
वर्ष 1210 ईस्वी में चौगान (पोलो) खेलते समय घोड़े से गिर जाने के कारण ऐबक की अचानक मृत्यु हो गई।
ऐबक के बाद शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1211-1236 ई.) शासक बना, जिसे दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक मानते हैं।
इल्तुतमिश ने अपनी सल्तनत की राजधानी को लाहौर से स्थानांतरित करके दिल्ली को केंद्र बनाया।
उसने कुतुब मीनार का अधूरा निर्माण पूरा करवाया और ‘चांदी का टंका’ व ‘तांबे का जीतल’ नामक सिक्के चलाए।
इल्तुतमिश ने प्रशासनिक सुदृढ़ता के लिए ‘इक्तादारी प्रथा’ और ‘तुर्कान-ए-चहलगानी’ (चालीस सरदारों का दल) की शुरुआत की।
इल्तुतमिश की पुत्री रजिया सुल्तान (1236-1240 ई.) भारत की पहली और एकमात्र महिला मुस्लिम शासिका बनी।
रजिया पुरुषों की तरह कोट (काबा) और टोपी (कुलाह) पहनकर दरबार में बैठती थी, जिससे तुर्की अमीर नाराज रहते थे।
तुर्की अमीरों के भारी विरोध और विद्रोह के कारण अंततः 1240 ईस्वी में रजिया सुल्तान की हत्या कर दी गई।
इसके बाद गयासुद्दीन बलबन (1266-1287 ई.) गद्दी पर बैठा, जिसने आंतरिक विद्रोहों को दबाने के लिए ‘लौह एवं रक्त की नीति’ अपनाई।
बलबन ने इल्तुतमिश द्वारा बनाए गए ‘तुर्कान-ए-चहलगानी’ दल को पूरी तरह समाप्त कर दिया ताकि सुल्तान की शक्ति बनी रहे।
बलबन ने दरबार में सम्राट की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए ‘सिजदा’ (साष्टांग प्रणाम) और ‘पाबोस’ (चरण चूमना) जैसी प्रथाएं अनिवार्य कीं।
गुलाम वंश का अंतिम शासक शम्सुद्दीन क्यूमर्स था, जिसकी हत्या के बाद 1290 ईस्वी में खिलजी वंश की स्थापना हुई।
खिलजी वंश
गुलाम वंश के पतन के बाद, दिल्ली सल्तनत पर खिलजी वंश का शासन स्थापित हुआ, जिसने 1290 से 1320 ईस्वी तक शासन किया।
इस वंश की स्थापना को इतिहास में ‘खिलजी क्रांति’ कहा जाता है, क्योंकि इसने सत्ता में तुर्की अमीरों के एकाधिकार को समाप्त किया।
खिलजी क्रांति ने जन्म और वंश के बजाय योग्यता को प्रशासनिक पदों का मुख्य आधार बनाया।
खिलजी वंश का संस्थापक जलाल-उद-दीन फिरोज खिलजी (1290-1296 ईस्वी) था।
जलाल-उद-दीन एक वृद्ध और उदार शासक था, जिसने अपने शासन में ‘सहिष्णुता और उदारता की नीति’ अपनाई।
जलाल-उद-दीन फिरोज खिलजी ने रणथंभौर पर आक्रमण किया, लेकिन वह उसे जीतने में असफल रहा।
वर्ष 1296 ईस्वी में जलाल-उद-दीन के भतीजे और दामाद अलाउद्दीन खिलजी ने धोखे से उसकी हत्या कर दी।
अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ईस्वी) इस वंश का सबसे महान, महत्वाकांक्षी और शक्तिशाली शासक सिद्ध हुआ।
अपनी विश्व-विजय की महत्वाकांक्षा के कारण अलाउद्दीन खिलजी ने ‘सिकंदर-ए-सानी’ (दूसरा सिकंदर) की उपाधि धारण की।
अलाउद्दीन खिलजी ने केंद्र में एक विशाल स्थायी सेना का गठन किया और सैनिकों को नकद वेतन देना शुरू किया।
उसने सेना में भ्रष्टाचार रोकने के लिए ‘दाग’ (घोड़ों को दागना) और ‘हुलिया’ (सैनिकों का हुलिया लिखना) प्रथाओं की शुरुआत की।
अलाउद्दीन खिलजी ने जनता और सैनिकों को सस्ती दरों पर वस्तुएं उपलब्ध कराने के लिए सख्त ‘मूल्य नियंत्रण और बाजार नीति’ लागू की।
उसने आर्थिक सुधारों के तहत भू-राजस्व में भारी वृद्धि करते हुए ‘खराज’ (भूमि कर) को उपज का 50% तक बढ़ा दिया।
अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में दिल्ली सल्तनत पर कई भीषण मंगोल आक्रमण हुए, जिनका उसने सफलतापूर्वक सामना किया।
उसने उत्तर भारत में गुजरात, मालवा, रणथंभौर और चित्तौड़गढ़ (रानी पद्मिनी प्रकरण से जुड़ा) पर विजय प्राप्त की।
अलाउद्दीन खिलजी दक्षिण भारत पर सैन्य अभियान भेजने वाला दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान बना।
दक्षिण भारत के इन सभी सफल सैन्य अभियानों का नेतृत्व अलाउद्दीन के वफादार सेनापति मलिक काफूर ने किया था।
अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी (1316-1320 ईस्वी) गद्दी पर बैठा, जो एक अयोग्य शासक था।
मुबारक खिलजी ने दिल्ली सल्तनत के इतिहास में स्वयं को ‘खलीफा’ घोषित कर दिया था, लेकिन उसके वजीर खुसरो खान ने उसकी हत्या कर दी।
खुसरो खान को पराजित कर गाजी मलिक (गयासुद्दीन तुगलक) ने दिल्ली पर तुगलक वंश की स्थापना की और खिलजी वंश का अंत हुआ।
तुगलक वंश
खिलजी वंश के पतन के बाद, दिल्ली सल्तनत पर तुगलक वंश का शासन स्थापित हुआ, जिसने 1320 से 1414 ईस्वी तक शासन किया।
यह दिल्ली सल्तनत के इतिहास में सबसे लंबे समय (लगभग 94 वर्ष) तक शासन करने वाला राजवंश था।
इस वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक (गाजी मलिक) था, जिसने खिलजी वंश के अंतिम शासक खुसरो खान को पराजित किया था।
गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली का पहला सुल्तान था, जिसने अपने नाम के आगे ‘गाजी’ शब्द जोड़ा था।
उसने दिल्ली के पास एक नए शहर ‘तुगलकाबाद’ की स्थापना की और वहां एक मजबूत किले का निर्माण करवाया।
गयासुद्दीन ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए दिल्ली सल्तनत में पहली बार नहरों का निर्माण शुरू करवाया।
वर्ष 1325 ईस्वी में एक लकड़ी के महल (मंडप) के ढह जाने से गयासुद्दीन तुगलक की अचानक मृत्यु हो गई।
उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र जूना खान ‘मुहम्मद बिन तुगलक’ (1325-1351 ईस्वी) के नाम से गद्दी पर बैठा।
मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली सल्तनत का सबसे शिक्षित, विद्वान परंतु सबसे विवादास्पद और महत्वाकांक्षी शासक था।
उसकी अव्यावहारिक और असफल योजनाओं के कारण उसे इतिहास में ‘पागल सुल्तान’ या ‘विरोधाभासों का मिश्रण’ कहा गया।
उसने अपनी राजधानी को दिल्ली से बदलकर महाराष्ट्र के देवगिरी (दौलताबाद) स्थानांतरित किया, जो पूरी तरह विफल रहा।
उसने चांदी की कमी को दूर करने के लिए तांबे और पीतल की ‘सांकेतिक मुद्रा’ चलाई, लेकिन नकली सिक्कों के कारण यह योजना भी फ्लॉप हो गई।
मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में प्रसिद्ध मोरक्को का यात्री ‘इब्न बतूता’ भारत आया था, जिसे सुल्तान ने दिल्ली का काजी नियुक्त किया।
उसके अंतिम दिनों में सल्तनत में भारी विद्रोह हुए, जिसके परिणामस्वरूप दक्षिण में विजयनगर और बहमनी जैसे स्वतंत्र राज्य बने।
मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद उसका चचेरा भाई फिरोजशाह तुगलक (1351-1388 ईस्वी) दिल्ली का सुल्तान बना।
फिरोजशाह तुगलक ने एक कल्याणकारी शासक के रूप में कार्य किया और शरीयत के अनुकूल केवल 4 मुख्य कर (जजिया, जकात, खराज, खुम्स) लगाए।
उसने सिंचाई के लिए बड़ी नहरों का जाल बिछवाया और जौनपुर, फिरोजाबाद, हिसार व फतेहाबाद जैसे कई नए नगरों की स्थापना की।
फिरोजशाह ने गरीबों की मदद के लिए ‘दीवान-ए-खैरात’ और दासों की देखभाल के लिए ‘दीवान-ए-बंदनगान’ विभागों की स्थापना की।
वर्ष 1398 ईस्वी में इस वंश के शासक नसीरुद्दीन महमूद के समय क्रूर मंगोल आक्रमणकारी तैमूर लंग ने दिल्ली पर भीषण आक्रमण किया।
तैमूर के आक्रमण ने तुगलक वंश को पूरी तरह कमजोर कर दिया, जिससे अंततः 1414 ईस्वी में इस वंश का अंत हो गया।
सैय्यद और लोदी वंश
तुगलक वंश के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत पर सैयद वंश का शासन स्थापित हुआ, जिसने 1414 से 1451 ईस्वी तक शासन किया।
इस वंश का संस्थापक खिज्र खाँ था, जो तैमूर लंग का सेनापति था और उसने कभी ‘सुल्तान’ की उपाधि धारण नहीं की।
खिज्र खाँ स्वयं को ‘रैयत-ए-आला’ कहता था और वह तैमूर के पुत्र शाहरुख को नियमित रूप से कर भेजता था।
सैयद वंश के शासकों ने स्वयं को पैगंबर मुहम्मद का वंशज बताया, इसी कारण इस वंश का नाम ‘सैयद’ पड़ा।
खिज्र खाँ के बाद मुबारक शाह सुल्तान बना, जिसने ‘मुबारकाबाद’ नामक शहर बसाया और उसके संरक्षण में ‘तारीख-ए-मुबारकशाही’ लिखी गई।
सैयद वंश का अंतिम शासक अलाउद्दीन आलम शाह था, जो एक बेहद कमजोर और अयोग्य शासक सिद्ध हुआ।
आलम शाह स्वेच्छा से दिल्ली छोड़कर बदायूँ चला गया, जिसके बाद बहलोल लोदी ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया।
बहलोल लोदी (1451-1489 ई.) ने दिल्ली सल्तनत के पहले अफगान राजवंश यानी लोदी वंश की स्थापना की।
बहलोल लोदी एक उदार शासक था और वह अपने सरदारों का इतना सम्मान करता था कि उनके खड़े रहने पर स्वयं भी खड़ा रहता था।
बहलोल लोदी के बाद उसका पुत्र सिकंदर लोदी (1489-1517 ई.) गद्दी पर बैठा, जो इस वंश का सबसे महान शासक था।
सिकंदर लोदी ने 1504 ईस्वी में आगरा शहर की स्थापना की और 1506 में इसे अपनी नई राजधानी बनाया।
उसने कृषि और माप के लिए ‘गज-ए-सिकंदरी’ नामक एक नया पैमाना शुरू किया, जो काफी समय तक प्रचलित रहा।
सिकंदर लोदी एक कवि भी था और वह फारसी भाषा में ‘गुलरूखी’ उपनाम से कविताएं लिखता था।
सिकंदर लोदी ने ज्वालामुखी मंदिर की मूर्ति को तोड़कर उसके टुकड़ों को कसाइयों को मांस तोलने के लिए दे दिया था।
सिकंदर लोदी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र इब्राहिम लोदी (1517-1526 ई.) दिल्ली का अंतिम सुल्तान बना।
इब्राहिम लोदी एक हठी और अभिमानी शासक था, जिसके कारण उसके अपने ही अफगान सरदार उसके शत्रु बन गए।
इब्राहिम लोदी की कठोरता से तंग आकर पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ लोदी ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया।
21 अप्रैल 1526 को पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी का सामना मुगल शासक बाबर से हुआ।
इस युद्ध में इब्राहिम लोदी मारा गया, और वह दिल्ली सल्तनत का एकमात्र सुल्तान था जो युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुआ।
इब्राहिम लोदी की हार के साथ ही दिल्ली सल्तनत और लोदी वंश का अंत हो गया और भारत में मुगल साम्राज्य की शुरुआत हुई।
दिल्ली सल्तनत का प्रशासन और समाज
दिल्ली सल्तनत (1206-1526 ईस्वी) का प्रशासन मुख्य रूप से इस्लामी कानून यानी शरीयत पर आधारित था।
इस व्यवस्था में सुल्तान राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता था, जिसके पास राजनीतिक, न्यायिक और सैन्य शक्तियां केंद्रित थीं।
सुल्तान बलबन के समय से शासक को पृथ्वी पर अल्लाह का प्रतिनिधि यानी ‘ज़िल-ए-इलाही’ माना जाने लगा था।
सुल्तान की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद होती थी, जिसमें ‘वजीर’ प्रधानमंत्री और वित्त विभाग (दीवान-ए-वजारत) का प्रमुख होता था।
सैन्य विभाग को ‘दीवान-ए-अर्ज’ कहा जाता था और इसके प्रमुख ‘आरिज-ए-मुमालिक’ थे, जिसकी स्थापना बलबन ने की थी।
धार्मिक मामलों, दान और न्याय के प्रमुख को ‘सद्र-उस-सुदूर’ तथा मुख्य न्यायाधीश को ‘काजी-उल-कुजात’ कहा जाता था।
शाही पत्राचार के लिए ‘दीवान-ए-इन्शा’ और गुप्तचर व्यवस्था की देखरेख के लिए ‘बरीद-ए-मुमालिक’ विभाग काम करता था।
विभिन्न सुल्तानों ने नए विभाग बनाए; जैसे मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषि के विकास के लिए ‘दीवान-ए-कोही’ की स्थापना की।
अलाउद्दीन खिलजी ने बकाया राजस्व की वसूली के लिए ‘दीवान-ए-मुस्तखराज’ नामक एक विशेष विभाग का गठन किया।
फिरोजशाह तुगलक ने गरीबों की मदद के लिए ‘दीवान-ए-खैरात’ और दासों के लिए ‘दीवान-ए-बंदनगान’ विभाग बनाए।
प्रांतीय प्रशासन के तहत पूरे साम्राज्य को प्रांतों में विभाजित किया गया था, जिन्हें ‘इक्ता’ कहा जाता था।
इक्ता के गवर्नर को ‘इक्तादार’, ‘मुक्ती’ या ‘वाली’ कहते थे, जो कानून-व्यवस्था बनाए रखने और कर वसूलने के लिए जिम्मेदार थे।
प्रांतों या इक्ताओं को आगे ‘शिक’ (जिलों) में बांटा गया था, जिसका प्रशासनिक प्रमुख ‘शिकदार’ होता था।
जिलों को ‘परगना’ में विभाजित किया गया था और प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ‘गाँव’ होती थी।
ग्रामीण स्तर पर कर वसूलने और शासन संभालने का मुख्य कार्य ‘मुकद्दम’ या ‘चौधरी’ नामक स्थानीय अधिकारी करते थे।
राज्य की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था, जिसे ‘खराज’ कहा जाता था और यह सामान्यतः उपज का 1/3 से 1/2 भाग होता था।
गैर-मुस्लिमों से ‘जजिया’ नामक धार्मिक कर और मुस्लिमों से उनकी संपत्ति पर ‘जकात’ नामक स्वैच्छिक धार्मिक कर लिया जाता था।
युद्ध में लूटे गए धन को ‘खुम्स’ कहा जाता था, जिसका एक हिस्सा सुल्तान के खजाने में और बाकी सैनिकों में बंटता था।
सल्तनत कालीन समाज मुख्य रूप से दो बड़े धार्मिक वर्गों—मुस्लिम और हिंदू—में विभाजित था, जिसमें शासक वर्ग में तुर्क और अफगान शामिल थे।
इस काल में अमीर वर्ग का अत्यधिक प्रभाव था और समाज में दास प्रथा तथा महिलाओं में पर्दा प्रथा का काफी प्रचलन था।