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अरब आक्रमण

  • हर्षवर्धन के साम्राज्य के पतन के बाद भारत में फैली राजनीतिक अस्थिरता के बीच अरबों ने भारत की ओर रुख किया।
  • अरबों के आक्रमण का मुख्य उद्देश्य इस्लाम धर्म का प्रचार करना और भारत की अपार धन-संपत्ति को प्राप्त करना था।
  • भारत पर पहला सफल मुस्लिम आक्रमण 8वीं शताब्दी की शुरुआत में 712 ईस्वी में हुआ था।
  • इस ऐतिहासिक सैन्य अभियान का नेतृत्व एक युवा अरब सेनापति मोहम्मद बिन कासिम ने किया था।
  • कासिम को इराक के प्रांतीय गवर्नर अल-हज्जाज और दमिश्क के उमय्यद खलीफा अल-वलीद प्रथम ने भेजा था।
  • आक्रमण का तात्कालिक कारण देबल बंदरगाह के पास समुद्री डाकुओं द्वारा अरब जहाजों को लूटना था।
  • जब सिंध के राजा दाहिर ने डाकुओं पर कार्रवाई करने या हर्जाना देने से मना किया, तो खलीफा ने युद्ध की अनुमति दी।
  • मोहम्मद बिन कासिम ने सबसे पहले सिंध के तटीय शहर देबल (आधुनिक कराची के पास) पर हमला कर उसे जीता।
  • देबल के बाद अरब सेना ने निरुन नामक स्थान की ओर कूच किया, जहाँ बौद्ध नागरिकों ने बिना लड़े आत्मसमर्पण कर दिया।
  • 20 जून 712 ईस्वी को मोहम्मद बिन कासिम और राजा दाहिर के बीच रावर का भयंकर और निर्णायक युद्ध हुआ।
  • राजा दाहिर ने इस युद्ध में अभूतपूर्व वीरता दिखाई, लेकिन अंततः वे युद्ध मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए।
  • राजा दाहिर की मृत्यु के बाद उनकी रानी रानीबाई ने रावर के किले की रक्षा की और अंत में अन्य महिलाओं के साथ ‘जौहर’ किया।
  • सिंध पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने के बाद मोहम्मद बिन कासिम ने उत्तर की ओर बढ़कर मुल्तान पर आक्रमण किया।
  • 713 ईस्वी में मुल्तान पर अरबों का अधिकार हो गया, जहाँ से उन्हें इतना सोना मिला कि उन्होंने इसे ‘सोने का शहर’ नाम दिया।
  • इस पूरे आक्रमण और सिंध की तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक स्थिति का सबसे प्रामाणिक विवरण ‘चचनामा’ नामक ग्रंथ में मिलता है।
  • आंतरिक विश्वासघात, स्थानीय बौद्धों का असहयोग और राजपूत राजाओं में एकता की कमी अरबों की सफलता के प्रमुख कारण थे।
  • सिंध और मुल्तान जीतने के बाद भी अरब आक्रमणकारी भारत के आंतरिक हिस्सों (जैसे राजस्थान, गुजरात और मालवा) में आगे नहीं बढ़ सके।
  • प्रतिहार राजा नागभट्ट प्रथम और चालुक्य शासक पुलकेशी जैसे वीर भारतीय राजाओं ने अरबों को आगे बढ़ने से मजबूती से रोक दिया।
  • इस आक्रमण के सांस्कृतिक प्रभाव के रूप में भारतीयों के खगोल विज्ञान, गणित (शून्य और दशमलव) और चिकित्सा का ज्ञान अरबों के माध्यम से यूरोप पहुँचा।
  • यद्यपि अरब आक्रमण का भारत पर राजनीतिक प्रभाव सीमित रहा, लेकिन इसने भविष्य के तुर्क आक्रमणों (गजनवी और गोरी) के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया।

तुर्क आक्रमण

  • भारत पर मुस्लिम आक्रमणों की दूसरी और अधिक निर्णायक लहर तुर्कों द्वारा शुरू हुई, जो 10वीं शताब्दी के अंत से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक चली।
  • अरब आक्रमणों के विपरीत, तुर्क आक्रमणों का उद्देश्य केवल लूटपाट करना नहीं बल्कि भारत में स्थायी मुस्लिम शासन स्थापित करना भी था।
  • इन आक्रमणों के प्रमुख कारणों में इस्लाम का प्रसार, जिहाद की भावना, भारत की अकूत धन-संपत्ति को लूटना और राजनीतिक विस्तार शामिल था।
  • तत्कालीन भारत में राजनीतिक एकता का अभाव और छोटे राजपूत राज्यों के आपसी संघर्ष ने तुर्कों की सफलता का मार्ग आसान किया।
  • महमूद गजनवी (998-1030 ईस्वी) भारत पर आक्रमण करने वाला पहला प्रमुख तुर्क शासक था, जो गजनी (अफगानिस्तान) का रहने वाला था।
  • महमूद गजनवी का मुख्य उद्देश्य भारत की धन-संपत्ति को लूटना था, इसलिए उसने भारत पर कुल 17 बार आक्रमण किए।
  • उसने अपने पहले आक्रमण (1000-1001 ईस्वी) में सीमावर्ती क्षेत्रों के हिंदूशाही शासक जयपाल को पराजित किया था।
  • 1025-1026 ईस्वी में गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर पर किया गया आक्रमण महमूद गजनवी का सबसे विनाशकारी और प्रसिद्ध आक्रमण था।
  • सोमनाथ आक्रमण के समय वहाँ का शासक चालुक्य वंश का भीमदेव प्रथम था और महमूद ने मंदिर से भारी मात्रा में सोना-चांदी लूटा।
  • महमूद गजनवी के दरबार में अल-बरूनी (‘किताब-उल-हिंद’ के लेखक) और फिरदौसी (‘शाहनामा’ के लेखक) जैसे महान विद्वान निवास करते थे।
  • गजनवी के विपरीत, गोर (अफगानिस्तान) वंश के मुहम्मद गोरी का मुख्य उद्देश्य भारत में स्थायी मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना करना था।
  • मुहम्मद गोरी ने 1175 ईस्वी में मुल्तान पर अपना पहला सफल आक्रमण किया और उसे जीत लिया।
  • 1178 ईस्वी में गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय ने आबू पर्वत के पास मुहम्मद गोरी को भारत में उसकी पहली बड़ी शिकस्त दी।
  • 1191 ईस्वी में तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) ने मुहम्मद गोरी को बुरी तरह पराजित किया और उसे भागने पर मजबूर कर दिया।
  • 1192 ईस्वी में तराइन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गोरी ने रणनीति बदलकर पृथ्वीराज चौहान को निर्णायक रूप से पराजित किया और बंदी बना लिया।
  • तराइन का दूसरा युद्ध भारतीय इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने भारत में तुर्की शासन की स्थापना का द्वार खोल दिया।
  • 1194 ईस्वी में चंदावर के युद्ध में गोरी ने कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद को पराजित कर मार डाला और कन्नौज पर अधिकार कर लिया।
  • 1206 ईस्वी में सिंधु नदी के किनारे खोखरों द्वारा मुहम्मद गोरी की हत्या कर दी गई, जिसके बाद उसके भारतीय विजित प्रदेशों की कमान उसके सेनापतियों के हाथ में आ गई।
  • गोरी की मृत्यु के बाद उसके प्रमुख दास और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत और गुलाम वंश की स्थापना की।
  • अंततः, इन तुर्क आक्रमणों ने उत्तर भारत में राजपूत शक्ति का अंत किया और भारत में एक नई ‘इंडो-इस्लामिक’ संस्कृति के विकास की शुरुआत की।

दिल्ली सल्तनत

गुलाम वंश

  • मुहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद उसके गुलाम सेनापतियों ने भारतीय प्रदेशों पर नियंत्रण कर दिल्ली सल्तनत की नींव रखी।
  • दिल्ली सल्तनत का पहला राजवंश गुलाम वंश (मामलूक वंश) था, जिसने 1206 से 1290 ईस्वी तक शासन किया।
  • ‘मामलूक’ एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ ‘स्वतंत्र माता-पिता से उत्पन्न दास’ होता है।
  • इस वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210 ई.) था, जो मुहम्मद गोरी का प्रतिभाशाली गुलाम सेनापति था।
  • ऐबक ने कभी ‘सुल्तान’ की उपाधि धारण नहीं की और उसने अपनी राजधानी लाहौर में स्थापित की थी।
  • ऐबक ने दिल्ली में कुव्वत-उल-इस्लाम और अजमेर में अढाई दिन का झोपड़ा मस्जिद का निर्माण करवाया।
  • उसने सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की याद में कुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया था।
  • अपनी अत्यधिक उदारता के कारण कुतुबुद्दीन ऐबक को इतिहास में ‘लाखबख्श’ (लाखों का दाता) कहा जाता था।
  • वर्ष 1210 ईस्वी में चौगान (पोलो) खेलते समय घोड़े से गिर जाने के कारण ऐबक की अचानक मृत्यु हो गई।
  • ऐबक के बाद शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1211-1236 ई.) शासक बना, जिसे दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक मानते हैं।
  • इल्तुतमिश ने अपनी सल्तनत की राजधानी को लाहौर से स्थानांतरित करके दिल्ली को केंद्र बनाया।
  • उसने कुतुब मीनार का अधूरा निर्माण पूरा करवाया और ‘चांदी का टंका’ व ‘तांबे का जीतल’ नामक सिक्के चलाए।
  • इल्तुतमिश ने प्रशासनिक सुदृढ़ता के लिए ‘इक्तादारी प्रथा’ और ‘तुर्कान-ए-चहलगानी’ (चालीस सरदारों का दल) की शुरुआत की।
  • इल्तुतमिश की पुत्री रजिया सुल्तान (1236-1240 ई.) भारत की पहली और एकमात्र महिला मुस्लिम शासिका बनी।
  • रजिया पुरुषों की तरह कोट (काबा) और टोपी (कुलाह) पहनकर दरबार में बैठती थी, जिससे तुर्की अमीर नाराज रहते थे।
  • तुर्की अमीरों के भारी विरोध और विद्रोह के कारण अंततः 1240 ईस्वी में रजिया सुल्तान की हत्या कर दी गई।
  • इसके बाद गयासुद्दीन बलबन (1266-1287 ई.) गद्दी पर बैठा, जिसने आंतरिक विद्रोहों को दबाने के लिए ‘लौह एवं रक्त की नीति’ अपनाई।
  • बलबन ने इल्तुतमिश द्वारा बनाए गए ‘तुर्कान-ए-चहलगानी’ दल को पूरी तरह समाप्त कर दिया ताकि सुल्तान की शक्ति बनी रहे।
  • बलबन ने दरबार में सम्राट की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए ‘सिजदा’ (साष्टांग प्रणाम) और ‘पाबोस’ (चरण चूमना) जैसी प्रथाएं अनिवार्य कीं।
  • गुलाम वंश का अंतिम शासक शम्सुद्दीन क्यूमर्स था, जिसकी हत्या के बाद 1290 ईस्वी में खिलजी वंश की स्थापना हुई।

खिलजी वंश 

  • गुलाम वंश के पतन के बाद, दिल्ली सल्तनत पर खिलजी वंश का शासन स्थापित हुआ, जिसने 1290 से 1320 ईस्वी तक शासन किया।
  • इस वंश की स्थापना को इतिहास में ‘खिलजी क्रांति’ कहा जाता है, क्योंकि इसने सत्ता में तुर्की अमीरों के एकाधिकार को समाप्त किया।
  • खिलजी क्रांति ने जन्म और वंश के बजाय योग्यता को प्रशासनिक पदों का मुख्य आधार बनाया।
  • खिलजी वंश का संस्थापक जलाल-उद-दीन फिरोज खिलजी (1290-1296 ईस्वी) था।
  • जलाल-उद-दीन एक वृद्ध और उदार शासक था, जिसने अपने शासन में ‘सहिष्णुता और उदारता की नीति’ अपनाई।
  • जलाल-उद-दीन फिरोज खिलजी ने रणथंभौर पर आक्रमण किया, लेकिन वह उसे जीतने में असफल रहा।
  • वर्ष 1296 ईस्वी में जलाल-उद-दीन के भतीजे और दामाद अलाउद्दीन खिलजी ने धोखे से उसकी हत्या कर दी।
  • अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ईस्वी) इस वंश का सबसे महान, महत्वाकांक्षी और शक्तिशाली शासक सिद्ध हुआ।
  • अपनी विश्व-विजय की महत्वाकांक्षा के कारण अलाउद्दीन खिलजी ने ‘सिकंदर-ए-सानी’ (दूसरा सिकंदर) की उपाधि धारण की।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने केंद्र में एक विशाल स्थायी सेना का गठन किया और सैनिकों को नकद वेतन देना शुरू किया।
  • उसने सेना में भ्रष्टाचार रोकने के लिए ‘दाग’ (घोड़ों को दागना) और ‘हुलिया’ (सैनिकों का हुलिया लिखना) प्रथाओं की शुरुआत की।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने जनता और सैनिकों को सस्ती दरों पर वस्तुएं उपलब्ध कराने के लिए सख्त ‘मूल्य नियंत्रण और बाजार नीति’ लागू की।
  • उसने आर्थिक सुधारों के तहत भू-राजस्व में भारी वृद्धि करते हुए ‘खराज’ (भूमि कर) को उपज का 50% तक बढ़ा दिया।
  • अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में दिल्ली सल्तनत पर कई भीषण मंगोल आक्रमण हुए, जिनका उसने सफलतापूर्वक सामना किया।
  • उसने उत्तर भारत में गुजरात, मालवा, रणथंभौर और चित्तौड़गढ़ (रानी पद्मिनी प्रकरण से जुड़ा) पर विजय प्राप्त की।
  • अलाउद्दीन खिलजी दक्षिण भारत पर सैन्य अभियान भेजने वाला दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान बना।
  • दक्षिण भारत के इन सभी सफल सैन्य अभियानों का नेतृत्व अलाउद्दीन के वफादार सेनापति मलिक काफूर ने किया था।
  • अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी (1316-1320 ईस्वी) गद्दी पर बैठा, जो एक अयोग्य शासक था।
  • मुबारक खिलजी ने दिल्ली सल्तनत के इतिहास में स्वयं को ‘खलीफा’ घोषित कर दिया था, लेकिन उसके वजीर खुसरो खान ने उसकी हत्या कर दी।
  • खुसरो खान को पराजित कर गाजी मलिक (गयासुद्दीन तुगलक) ने दिल्ली पर तुगलक वंश की स्थापना की और खिलजी वंश का अंत हुआ।

तुगलक वंश

  • खिलजी वंश के पतन के बाद, दिल्ली सल्तनत पर तुगलक वंश का शासन स्थापित हुआ, जिसने 1320 से 1414 ईस्वी तक शासन किया।
  • यह दिल्ली सल्तनत के इतिहास में सबसे लंबे समय (लगभग 94 वर्ष) तक शासन करने वाला राजवंश था।
  • इस वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक (गाजी मलिक) था, जिसने खिलजी वंश के अंतिम शासक खुसरो खान को पराजित किया था।
  • गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली का पहला सुल्तान था, जिसने अपने नाम के आगे ‘गाजी’ शब्द जोड़ा था।
  • उसने दिल्ली के पास एक नए शहर ‘तुगलकाबाद’ की स्थापना की और वहां एक मजबूत किले का निर्माण करवाया।
  • गयासुद्दीन ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए दिल्ली सल्तनत में पहली बार नहरों का निर्माण शुरू करवाया।
  • वर्ष 1325 ईस्वी में एक लकड़ी के महल (मंडप) के ढह जाने से गयासुद्दीन तुगलक की अचानक मृत्यु हो गई।
  • उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र जूना खान ‘मुहम्मद बिन तुगलक’ (1325-1351 ईस्वी) के नाम से गद्दी पर बैठा।
  • मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली सल्तनत का सबसे शिक्षित, विद्वान परंतु सबसे विवादास्पद और महत्वाकांक्षी शासक था।
  • उसकी अव्यावहारिक और असफल योजनाओं के कारण उसे इतिहास में ‘पागल सुल्तान’ या ‘विरोधाभासों का मिश्रण’ कहा गया।
  • उसने अपनी राजधानी को दिल्ली से बदलकर महाराष्ट्र के देवगिरी (दौलताबाद) स्थानांतरित किया, जो पूरी तरह विफल रहा।
  • उसने चांदी की कमी को दूर करने के लिए तांबे और पीतल की ‘सांकेतिक मुद्रा’ चलाई, लेकिन नकली सिक्कों के कारण यह योजना भी फ्लॉप हो गई।
  • मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में प्रसिद्ध मोरक्को का यात्री ‘इब्न बतूता’ भारत आया था, जिसे सुल्तान ने दिल्ली का काजी नियुक्त किया।
  • उसके अंतिम दिनों में सल्तनत में भारी विद्रोह हुए, जिसके परिणामस्वरूप दक्षिण में विजयनगर और बहमनी जैसे स्वतंत्र राज्य बने।
  • मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद उसका चचेरा भाई फिरोजशाह तुगलक (1351-1388 ईस्वी) दिल्ली का सुल्तान बना।
  • फिरोजशाह तुगलक ने एक कल्याणकारी शासक के रूप में कार्य किया और शरीयत के अनुकूल केवल 4 मुख्य कर (जजिया, जकात, खराज, खुम्स) लगाए।
  • उसने सिंचाई के लिए बड़ी नहरों का जाल बिछवाया और जौनपुर, फिरोजाबाद, हिसार व फतेहाबाद जैसे कई नए नगरों की स्थापना की।
  • फिरोजशाह ने गरीबों की मदद के लिए ‘दीवान-ए-खैरात’ और दासों की देखभाल के लिए ‘दीवान-ए-बंदनगान’ विभागों की स्थापना की।
  • वर्ष 1398 ईस्वी में इस वंश के शासक नसीरुद्दीन महमूद के समय क्रूर मंगोल आक्रमणकारी तैमूर लंग ने दिल्ली पर भीषण आक्रमण किया।
  • तैमूर के आक्रमण ने तुगलक वंश को पूरी तरह कमजोर कर दिया, जिससे अंततः 1414 ईस्वी में इस वंश का अंत हो गया।

सैय्यद और लोदी वंश

  • तुगलक वंश के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत पर सैयद वंश का शासन स्थापित हुआ, जिसने 1414 से 1451 ईस्वी तक शासन किया।
  • इस वंश का संस्थापक खिज्र खाँ था, जो तैमूर लंग का सेनापति था और उसने कभी ‘सुल्तान’ की उपाधि धारण नहीं की।
  • खिज्र खाँ स्वयं को ‘रैयत-ए-आला’ कहता था और वह तैमूर के पुत्र शाहरुख को नियमित रूप से कर भेजता था।
  • सैयद वंश के शासकों ने स्वयं को पैगंबर मुहम्मद का वंशज बताया, इसी कारण इस वंश का नाम ‘सैयद’ पड़ा।
  • खिज्र खाँ के बाद मुबारक शाह सुल्तान बना, जिसने ‘मुबारकाबाद’ नामक शहर बसाया और उसके संरक्षण में ‘तारीख-ए-मुबारकशाही’ लिखी गई।
  • सैयद वंश का अंतिम शासक अलाउद्दीन आलम शाह था, जो एक बेहद कमजोर और अयोग्य शासक सिद्ध हुआ।
  • आलम शाह स्वेच्छा से दिल्ली छोड़कर बदायूँ चला गया, जिसके बाद बहलोल लोदी ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया।
  • बहलोल लोदी (1451-1489 ई.) ने दिल्ली सल्तनत के पहले अफगान राजवंश यानी लोदी वंश की स्थापना की।
  • बहलोल लोदी एक उदार शासक था और वह अपने सरदारों का इतना सम्मान करता था कि उनके खड़े रहने पर स्वयं भी खड़ा रहता था।
  • बहलोल लोदी के बाद उसका पुत्र सिकंदर लोदी (1489-1517 ई.) गद्दी पर बैठा, जो इस वंश का सबसे महान शासक था।
  • सिकंदर लोदी ने 1504 ईस्वी में आगरा शहर की स्थापना की और 1506 में इसे अपनी नई राजधानी बनाया।
  • उसने कृषि और माप के लिए ‘गज-ए-सिकंदरी’ नामक एक नया पैमाना शुरू किया, जो काफी समय तक प्रचलित रहा।
  • सिकंदर लोदी एक कवि भी था और वह फारसी भाषा में ‘गुलरूखी’ उपनाम से कविताएं लिखता था।
  • सिकंदर लोदी ने ज्वालामुखी मंदिर की मूर्ति को तोड़कर उसके टुकड़ों को कसाइयों को मांस तोलने के लिए दे दिया था।
  • सिकंदर लोदी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र इब्राहिम लोदी (1517-1526 ई.) दिल्ली का अंतिम सुल्तान बना।
  • इब्राहिम लोदी एक हठी और अभिमानी शासक था, जिसके कारण उसके अपने ही अफगान सरदार उसके शत्रु बन गए।
  • इब्राहिम लोदी की कठोरता से तंग आकर पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ लोदी ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया।
  • 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी का सामना मुगल शासक बाबर से हुआ।
  • इस युद्ध में इब्राहिम लोदी मारा गया, और वह दिल्ली सल्तनत का एकमात्र सुल्तान था जो युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुआ।
  • इब्राहिम लोदी की हार के साथ ही दिल्ली सल्तनत और लोदी वंश का अंत हो गया और भारत में मुगल साम्राज्य की शुरुआत हुई।

दिल्ली सल्तनत का प्रशासन और समाज

  • दिल्ली सल्तनत (1206-1526 ईस्वी) का प्रशासन मुख्य रूप से इस्लामी कानून यानी शरीयत पर आधारित था।
  • इस व्यवस्था में सुल्तान राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता था, जिसके पास राजनीतिक, न्यायिक और सैन्य शक्तियां केंद्रित थीं।
  • सुल्तान बलबन के समय से शासक को पृथ्वी पर अल्लाह का प्रतिनिधि यानी ‘ज़िल-ए-इलाही’ माना जाने लगा था।
  • सुल्तान की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद होती थी, जिसमें ‘वजीर’ प्रधानमंत्री और वित्त विभाग (दीवान-ए-वजारत) का प्रमुख होता था।
  • सैन्य विभाग को ‘दीवान-ए-अर्ज’ कहा जाता था और इसके प्रमुख ‘आरिज-ए-मुमालिक’ थे, जिसकी स्थापना बलबन ने की थी।
  • धार्मिक मामलों, दान और न्याय के प्रमुख को ‘सद्र-उस-सुदूर’ तथा मुख्य न्यायाधीश को ‘काजी-उल-कुजात’ कहा जाता था।
  • शाही पत्राचार के लिए ‘दीवान-ए-इन्शा’ और गुप्तचर व्यवस्था की देखरेख के लिए ‘बरीद-ए-मुमालिक’ विभाग काम करता था।
  • विभिन्न सुल्तानों ने नए विभाग बनाए; जैसे मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषि के विकास के लिए ‘दीवान-ए-कोही’ की स्थापना की।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने बकाया राजस्व की वसूली के लिए ‘दीवान-ए-मुस्तखराज’ नामक एक विशेष विभाग का गठन किया।
  • फिरोजशाह तुगलक ने गरीबों की मदद के लिए ‘दीवान-ए-खैरात’ और दासों के लिए ‘दीवान-ए-बंदनगान’ विभाग बनाए।
  • प्रांतीय प्रशासन के तहत पूरे साम्राज्य को प्रांतों में विभाजित किया गया था, जिन्हें ‘इक्ता’ कहा जाता था।
  • इक्ता के गवर्नर को ‘इक्तादार’, ‘मुक्ती’ या ‘वाली’ कहते थे, जो कानून-व्यवस्था बनाए रखने और कर वसूलने के लिए जिम्मेदार थे।
  • प्रांतों या इक्ताओं को आगे ‘शिक’ (जिलों) में बांटा गया था, जिसका प्रशासनिक प्रमुख ‘शिकदार’ होता था।
  • जिलों को ‘परगना’ में विभाजित किया गया था और प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ‘गाँव’ होती थी।
  • ग्रामीण स्तर पर कर वसूलने और शासन संभालने का मुख्य कार्य ‘मुकद्दम’ या ‘चौधरी’ नामक स्थानीय अधिकारी करते थे।
  • राज्य की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था, जिसे ‘खराज’ कहा जाता था और यह सामान्यतः उपज का 1/3 से 1/2 भाग होता था।
  • गैर-मुस्लिमों से ‘जजिया’ नामक धार्मिक कर और मुस्लिमों से उनकी संपत्ति पर ‘जकात’ नामक स्वैच्छिक धार्मिक कर लिया जाता था।
  • युद्ध में लूटे गए धन को ‘खुम्स’ कहा जाता था, जिसका एक हिस्सा सुल्तान के खजाने में और बाकी सैनिकों में बंटता था।
  • सल्तनत कालीन समाज मुख्य रूप से दो बड़े धार्मिक वर्गों—मुस्लिम और हिंदू—में विभाजित था, जिसमें शासक वर्ग में तुर्क और अफगान शामिल थे।
  • इस काल में अमीर वर्ग का अत्यधिक प्रभाव था और समाज में दास प्रथा तथा महिलाओं में पर्दा प्रथा का काफी प्रचलन था।

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