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प्रमुख व्यक्तित्व

उत्तराखंड के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी

  • उत्तराखंड की वीर भूमि ने देश की आजादी के आंदोलनों में अपनी महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय भूमिका निभाई है।
  • चम्पावत जिले के विशुंग गांव में जन्मे कालू सिंह महारा को उत्तराखंड का “प्रथम स्वतंत्रता सेनानी” माना जाता है।
  • कालू सिंह महारा ने 1857 की क्रांति के दौरान कुमाऊं क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ ‘क्रान्तिवीर’ नामक गुप्त संगठन बनाया था।
  • कुमाऊं केसरी के नाम से प्रसिद्ध बद्री दत्त पांडे ने राज्य में दमनकारी ‘कुली बेगार प्रथा’ के उन्मूलन में केंद्रीय भूमिका निभाई थी।
  • बद्री दत्त पांडे ने वर्ष 1921 में बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर हजारों आंदोलनकारियों के साथ कुली बेगार के रजिस्टरों को बहाकर इस कुप्रथा का अंत किया।
  • पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया और वे उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री तथा देश के गृहमंत्री बने।
  • ‘गदर पार्टी’ से प्रभावित होकर देहरादून के रासबिहारी बोस ने उत्तराखंड को अपनी गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र बनाया था।
  • टिहरी रियासत की राजशाही और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ वीर अमर शहीद श्रीदेव सुमन ने एक ऐतिहासिक व अभूतपूर्व संघर्ष छेड़ा था।
  • श्रीदेव सुमन ने जेल में अमानवीय व्यवहार के विरोध में 84 दिनों तक ऐतिहासिक भूख हड़ताल की और 25 जुलाई 1944 को शहीद हो गए।
  • पेशावर कांड (1930) के महानायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने निहत्थे अफगान स्वतंत्रता सेनानियों पर गोली चलाने के ब्रिटिश आदेश को मानने से इनकार कर दिया था।
  • चन्द्र सिंह गढ़वाली के इस अदम्य साहस के कारण ब्रिटिश सरकार ने पूरी गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों को कड़ा दंड और कारावास दिया था।
  • दुगड्डा (पौड़ी गढ़वाल) के भवानी सिंह रावत महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के घनिष्ठ सहयोगी थे और उन्होंने ‘गढ़वाल सर्वदलीय परिषद्’ की स्थापना की थी।
  • उत्तराखंड के महान स्वतंत्रता सेनानी हर्ष देव ओली को कुमाऊं में ‘काली कुमाऊं का शेर’ के नाम से जाना जाता है।
  • प्रसिद्ध पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी भक्त दर्शन तथा भैरव दत्त धूलिया ने ‘कर्मभूमि’ पत्र के माध्यम से लैंसडाउन क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना जागृत की।
  • अल्मोड़ा के खूंट गांव में जन्मे हरगोविंद पंत ने कुमाऊं क्षेत्र में कुली उतार और सामाजिक कुप्रथाओं के खिलाफ लंबा संघर्ष चलाया।
  • नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ (INA) में उत्तराखंड के वीर सैनिकों का योगदान अत्यधिक सराहनीय और संख्यात्मक रूप से बहुत बड़ा था।
  • कर्नल पितृशरण रतूड़ी और कैप्टन ज्ञान सिंह बिष्ट जैसे आईएनए के सैन्य अधिकारियों ने मोर्चे पर अदम्य वीरता का प्रदर्शन किया।
  • महिलाओं में बिश्नी देवी शाह उत्तराखंड की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्होंने अल्मोड़ा नगरपालिका भवन पर तिरंगा फहराया था।
  • इनके साथ ही कुन्ती वर्मा, भागीरथी देवी और सरस्वती देवी जैसी वीरांगनाओं ने भी जेल यात्राएं कीं और भारत छोड़ो आंदोलन को गति दी।
  • निष्कर्षतः, इन सभी महान देशभक्तों के बलिदान, तप और संघर्ष की बदौलत ही उत्तराखंड का नाम भारत के स्वाधीनता इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।

समाज सुधारक

  • उत्तराखंड का इतिहास ऐसे महान समाज सुधारकों से समृद्ध रहा है जिन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों को मिटाकर एक समतामूलक समाज की नींव रखी।
  • जयानंद भारती को उत्तराखंड में दलितों के अधिकारों और सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए सबसे प्रमुख समाज सुधारकों में गिना जाता है।
  • जयानंद भारती ने अछूतोद्धार आंदोलन चलाया और वर्ष 1923 में प्रसिद्ध ‘डोला-पालकी आंदोलन’ का सफल नेतृत्व किया था।
  • इस ऐतिहासिक आंदोलन का मुख्य उद्देश्य शिल्पकारों (दलितों) को विवाह के अवसर पर दूल्हा-दुल्हन को डोला-पालकी में बैठने का मौलिक अधिकार दिलाना था।
  • आर्य समाज के सिद्धांतों से प्रभावित होकर उन्होंने समाज में व्याप्त जातिवाद, छुआछूत और अंधविश्वास पर कड़ा प्रहार किया।
  • अल्मोड़ा के हरि प्रसाद टम्टा ने भी दलित वर्ग के उत्थान, उनकी शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
  • हरि प्रसाद टम्टा ने शिल्पकारों के मान-सम्मान को स्थापित करने के लिए ‘टम्टा सुधार सभा’ (1905) का गठन किया और ‘समता’ नामक समाचार पत्र का संपादन किया।
  • उत्तराखंड में शिक्षा के प्रसार और कुली-बेगार जैसी दमनकारी प्रथाओं के उन्मूलन में बद्री दत्त पांडे का योगदान अतुलनीय है।
  • प्रसिद्ध समाज सुधारक और शिक्षाविद् तारा दत्त गैरोला ने सरोला सभा के माध्यम से सामाजिक कुप्रथाओं को दूर करने और शिक्षा को बढ़ावा देने का कार्य किया।
  • इन्द्र सिंह नयाल ने स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ समाज सुधार और ग्रामीण क्षेत्रों में चेतना जगाने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए।
  • प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और समाज सुधारक चंडी प्रसाद भट्ट ने वनों के संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम किया।
  • चंडी प्रसाद भट्ट ने ‘दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल’ के माध्यम से युवाओं को संगठित किया और समाज में श्रम के प्रति सम्मान पैदा किया।
  • सुंदरलाल बहुगुणा ने न केवल ‘चिपको आंदोलन’ का नेतृत्व किया, बल्कि शराब विरोधी आंदोलनों और छुआछूत मिटाने के अभियानों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
  • महिलाओं के अधिकारों, नशामुक्ति और समाज सुधार के लिए टिहरी की प्रसिद्ध समाज सेविका गौरा देवी का नाम इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।
  • दीपा देवी (जिन्हें ‘इच्छागिरी माई’ या ‘टिंचरी माई’ भी कहा जाता है) ने पहाड़ों में अवैध शराब की बिक्री के खिलाफ एक उग्र और साहसिक आंदोलन चलाया था।
  • टिंचरी माई ने पौड़ी गढ़वाल के क्षेत्रों में घूम-घूम कर महिलाओं को संगठित किया और पुरुषों को नशे की लत से दूर रहने की प्रेरणा दी।
  • स्वामी विचित्रानंद सरस्वती ने दुगड्डा में ‘अभय’ पत्र और विद्यालयों की स्थापना के माध्यम से राष्ट्रीयता और सामाजिक चेतना का प्रसार किया।
  • सच्चिदानंद भारती ने दूधातोली क्षेत्र में ‘पानी राखो आंदोलन’ चलाकर पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण समुदायों को एकजुट और जागरूक किया।
  • इन सभी विचारकों ने शिक्षा को समाज सुधार का सबसे सशक्त माध्यम माना और इसके लिए कई शिक्षण संस्थानों की स्थापना को प्रोत्साहित किया।
  • निष्कर्षतः, इन निस्वार्थ सुधारकों के अथक प्रयासों के कारण ही उत्तराखंड के समाज में प्रगतिशील वैचारिक चेतना और सामाजिक समरसता का निरंतर विकास हुआ है।

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