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आर्थिक व्यवस्था

उत्तराखंड राज्य की अर्थव्यवस्था

  • उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था है, जिसे पारंपरिक रूप से ‘मनी ऑर्डर अर्थव्यवस्था’ कहा जाता था।
  • अतीत में राज्य की आर्थिक स्थिति काफी हद तक प्रवासियों द्वारा घर भेजे जाने वाले धन (Remittances) पर निर्भर थी।
  • सन 2000 में राज्य के गठन के बाद पर्यटन, जलविद्युत और औद्योगिक विकास ने अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दी है।
  • वर्तमान में राज्य की अर्थव्यवस्था के तीन प्रमुख स्तंभ प्राथमिक (कृषि), द्वितीयक (उद्योग) और तृतीयक (सेवा) क्षेत्र हैं।
  • सेवा क्षेत्र (Tertiary Sector) राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) में सबसे बड़ा योगदान देने वाला क्षेत्र है।
  • उत्तराखंड का सेवा क्षेत्र मुख्य रूप से पर्यटन, धार्मिक यात्राओं और आतिथ्य सत्कार (Hospitality) पर आधारित है।
  • कृषि क्षेत्र राज्य की अधिकांश ग्रामीण आबादी के लिए आज भी आजीविका और रोजगार का मुख्य स्रोत बना हुआ है।
  • पहाड़ी ढलानों पर छोटे और खंडित खेतों के कारण यहाँ सीढ़ीदार कृषि और घाटियों में खेती की जाती है।
  • यहाँ की मुख्य फसलों में गेहूँ, धान के साथ-साथ पारंपरिक मोटे अनाज जैसे मंडुआ (रागी) और झंगोरा शामिल हैं।
  • पहाड़ी जलवायु के कारण राज्य सेब, नाशपाती, आड़ू और बेमौसम सब्जियों जैसी बागवानी फसलों के लिए बहुत उपयुक्त है।
  • कृषि के क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और बेहतर मूल्य के लिए सरकार द्वारा जैविक खेती (Organic Farming) को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • राज्य गठन के बाद केंद्र के विशेष औद्योगिक पैकेज से सिडकुल (SIDCUL) ने मैदानी इलाकों में बड़े औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए हैं।
  • पंतनगर, हरिद्वार, सितारगंज और सेलाकुई (देहरादून) राज्य के सबसे प्रमुख और बड़े औद्योगिक केंद्र हैं।
  • इन केंद्रों में ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स (दवाइयाँ), खाद्य प्रसंस्करण और FMCG उद्योगों का बड़े पैमाने पर विकास हुआ है।
  • पर्यटन को उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, जिसमें चारधाम यात्रा और हरिद्वार-ऋषिकेश का मुख्य योगदान है।
  • साहसिक पर्यटन के लिए ऋषिकेश (रिवर राफ्टिंग) और औली (स्कीइंग) वैश्विक स्तर पर पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
  • जलविद्युत उत्पादन राज्य की आय का एक अन्य मुख्य स्रोत है, जिसमें टिहरी बांध परियोजना भारत की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक है।
  • इन सब के बावजूद, पहाड़ी क्षेत्रों से रोजगार के अभाव में होने वाला पलायन यहाँ की सबसे गंभीर आर्थिक व सामाजिक समस्या है।
  • इस निरंतर पलायन के कारण पहाड़ों में कई गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं, जिन्हें ‘घोस्ट विलेज’ कहा जाता है।
  • अंततः, मैदानी-पहाड़ी क्षेत्रों का आर्थिक असंतुलन, प्राकृतिक आपदाएं और मानव-वन्यजीव संघर्ष राज्य की अर्थव्यवस्था की मुख्य चुनौतियाँ हैं।

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