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ऊर्जा संसाधन

उत्तराखंड: जल विद्युत परियोजनाएँ

  • उत्तराखंड अपनी प्रचुर जल संपदा और पर्वतीय स्थलाकृति के कारण जलविद्युत उत्पादन के लिए अपार क्षमता रखता है।
  • राज्य की प्रचुर उत्पादन क्षमता के कारण ही उत्तराखंड को “ऊर्जा प्रदेश” के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई है।
  • आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड की अनुमानित कुल जलविद्युत उत्पादन क्षमता 25,000 मेगावाट से अधिक आंकी गई है।
  • राज्य में 2 मेगावाट तक की परियोजनाओं को सूक्ष्म, 2 से 25 मेगावाट तक को लघु और इससे अधिक को बड़ी परियोजना कहा जाता है।
  • जलविद्युत उत्पादन को सुचारू रूप से चलाने के लिए 12 फरवरी 2001 को उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (UJVNL) की स्थापना की गई।
  • राज्य को केंद्र या अन्य राज्यों द्वारा विकसित जलविद्युत परियोजनाओं से रॉयल्टी के रूप में 12 प्रतिशत बिजली निःशुल्क मिलती है।
  • भागीरथी और भिलंगना नदी के संगम पर निर्मित टिहरी बांध परियोजना राज्य की सबसे बड़ी (2400 मेगावाट) जलविद्युत परियोजना है।
  • टिहरी बांध एशिया का सबसे ऊंचा (5 मीटर) और दुनिया का चौथा सबसे ऊंचा मिट्टी और पत्थर पूरित (काफर) बांध है।
  • टिहरी बांध के विशाल जलाशय का आधिकारिक नाम स्वामी रामतीर्थ सागर है, जो लगभग 42 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।
  • उत्तरकाशी जिले में भागीरथी नदी पर मनेरी भाली परियोजना संचालित है, जो दो चरणों (तिलोथ और धरासू) में विभाजित है।
  • चमोली जिले में अलकनंदा नदी पर स्थित 400 मेगावाट की विष्णुप्रयाग परियोजना जेपी समूह द्वारा संचालित एक ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ परियोजना है।
  • पिथौरागढ़ के धारचूला में पूर्वी धौलीगंगा नदी पर 280 मेगावाट की धौलीगंगा परियोजना (चरण-1) का निर्माण NHPC द्वारा किया गया है।
  • देहरादून जिले में यमुना नदी पर बहुउद्देशीय लखवाड़-व्यासी परियोजना स्थित है, जिससे उत्तराखंड सहित कुल छह राज्य लाभान्वित होते हैं।
  • टोंस नदी पर निर्मित किशाऊ बांध परियोजना (660 मेगावाट) उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की एक संयुक्त राष्ट्रीय परियोजना है।
  • देहरादून के मसूरी स्थित भट्टा फॉल पर बनी ग्लोगी परियोजना (1909) उत्तराखंड और उत्तर भारत की पहली लघु जल विद्युत परियोजना थी।
  • इसके अतिरिक्त राज्य में तपोवन विष्णुगाड, सिंगोली भटवाड़ी, श्रीनगर और चीला जैसी कई अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाएं भी संचालित हैं।
  • प्रचुर संभावनाओं के बावजूद, हिमालय की संवेदनशील भूकंपीय संरचना के कारण इन बांधों की सुरक्षा पर लगातार सवाल उठते हैं।
  • वनों की कटाई, जैव विविधता का नुकसान और स्थानीय समुदायों का विस्थापन इन परियोजनाओं के सामने बड़ी सामाजिक-पर्यावरणीय चुनौतियां हैं।
  • बादल फटने और आकस्मिक बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी इन नदी घाटी परियोजनाओं के बुनियादी ढांचे के लिए बड़ा जोखिम पैदा करती हैं।
  • निष्कर्षतः, पर्यावरणीय स्थिरता और सामाजिक पुनर्वास को प्राथमिकता देकर ही उत्तराखंड सतत रूप से एक सफल ऊर्जा प्रदेश बन सकता है।

उत्तराखंड: सौर और पवन ऊर्जा

  • पारंपरिक जलविद्युत परियोजनाओं के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को देखते हुए उत्तराखंड में सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
  • उत्तराखंड को एक हरित और आत्मनिर्भर ऊर्जा राज्य बनाने के लिए वैकल्पिक ऊर्जा संसाधनों का विकास अत्यंत आवश्यक है।
  • राज्य में नवीकरणीय ऊर्जा विकास के लिए उत्तराखंड अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (UREDA) नोडल संस्था के रूप में कार्य करता है।
  • उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति के कारण यहाँ सौर ऊर्जा के दोहन के लिए प्रचुर धूप और उपयुक्त क्षेत्र उपलब्ध हैं।
  • राज्य में प्रतिवर्ष औसतन 250 से 300 दिन खिली हुई धूप उपलब्ध रहती है, जो सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए बेहद अनुकूल है।
  • उत्तराखंड सरकार द्वारा लागू की गई ‘उत्तराखंड सौर ऊर्जा नीति 2023’ राज्य में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने की एक महत्वाकांक्षी योजना है।
  • इस सौर नीति के तहत राज्य ने वर्ष 2027 तक कुल 2500 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का एक बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • इस लक्ष्य के अंतर्गत 1100 मेगावाट उपयोगिता-पैमाने (Utility-scale) की बड़ी परियोजनाओं और 750 मेगावाट घरेलू क्षेत्र के लिए तय किया गया है।
  • नीति में वाणिज्यिक व औद्योगिक उपयोग के लिए 350 मेगावाट और कृषि क्षेत्र के लिए 50 मेगावाट की क्षमता का आवंटन किया गया है।
  • ‘प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ और राज्य की अन्य पहलों के माध्यम से छतों पर रूफटॉप सोलर लगाने के लिए भारी सब्सिडी दी जा रही है।
  • सुदूर पर्वतीय गांवों में जहां ग्रिड पहुंचाना कठिन है, वहां ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्टम और सोलर माइक्रो-ग्रिड बिजली आपूर्ति का बड़ा माध्यम बन रहे हैं।
  • सौर ऊर्जा के उपयोग से वनों से लकड़ी काटने की निर्भरता कम हो रही है, जिससे राज्य के पर्यावरण और जैव विविधता का संरक्षण हो रहा है।
  • सौर ऊर्जा के साथ-साथ उत्तराखंड के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों और घाटियों में पवन ऊर्जा (Wind Energy) की भी व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।
  • कम वायुदाब पेटियों और पर्वतीय कटक (Hilltops) के कारण राज्य के कई हिस्सों में पवन चक्कियों के संचालन के लिए आवश्यक वायु गति प्राप्त होती है।
  • पवन ऊर्जा एक स्वच्छ और पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त स्रोत है, जो जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करने में सहायक है।
  • पहाड़ी ढलानों पर हाइब्रिड मॉडल (सौर और पवन ऊर्जा का संयुक्त रूप) स्थापित करने पर भी राज्य में विचार किया जा रहा है।
  • इन प्रचुर संभावनाओं के बावजूद, पर्वतीय क्षेत्रों में भारी उपकरणों और सोलर पैनलों को ले जाना तथा स्थापित करना एक बड़ी ढांचागत चुनौती है।
  • पवन ऊर्जा के मामले में हवा की गति की अनिश्चितता और मौसम का लगातार बदलना इसकी निरंतरता के सामने एक मुख्य बाधा है।
  • बिजली उत्पादन के बाद उसे सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों से मुख्य ग्रिड तक पहुंचाने के लिए लंबी और खर्चीली ट्रांसमिशन लाइनों की आवश्यकता होती है।
  • अंततः, वित्तीय जोखिमों को कम करके और आधुनिक तकनीकों को अपनाकर उत्तराखंड सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में एक अग्रणी मॉडल बन सकता है।

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