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परिवहन तंत्र

उत्तराखंड: सड़क परिवहन

  • उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए सड़क परिवहन जीवन रेखा के समान है।
  • राज्य में उबड़-खाबड़ और जटिल भौगोलिक संरचना के कारण अधिकांश क्षेत्रों में परिवहन का मुख्य साधन केवल सड़कें ही हैं।
  • उत्तराखंड में सड़क नेटवर्क को राष्ट्रीय राजमार्ग (NH), राज्य राजमार्ग (SH), जिला मुख्य सड़कें और ग्रामीण सड़कों में वर्गीकृत किया गया है।
  • केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) और राज्य लोक निर्माण विभाग (PWD) सड़कों के निर्माण और रखरखाव का कार्य करते हैं।
  • चारधाम यात्रा (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री) को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग राज्य के पर्यटन और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
  • ऋषिकेश-बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग (NH 58) और ऋषिकेश-गंगोत्री राजमार्ग (NH 94) राज्य के प्रमुख मार्ग हैं।
  • सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा और संपर्क के लिए सीमा सड़क संगठन (BRO) द्वारा महत्वपूर्ण सामरिक सड़कों का रखरखाव किया जाता है।
  • उत्तराखंड परिवहन निगम (UTC) की स्थापना 31 अक्टूबर 2003 को राज्य में सार्वजनिक बस परिवहन सेवा प्रदान करने के लिए की गई थी।
  • निगम का मुख्यालय देहरादून में स्थित है और यह राज्य के भीतर तथा अंतरराज्यीय मार्गों पर अपनी बस सेवाएं संचालित करता है।
  • पर्वतीय मार्गों पर सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करने के लिए निगम और निजी ऑपरेटर विशेष रूप से प्रशिक्षित ड्राइवरों को नियुक्त करते हैं।
  • राज्य सरकार सुदूरवर्ती पर्वतीय गांवों को मुख्य विकास मार्गों से जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) को तेजी से लागू कर रही है।
  • गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी स्थापित करने के लिए ‘कंडी मार्ग’ जैसे वैकल्पिक रास्तों पर काम किया जा रहा है।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन, भारी वर्षा और बर्फबारी के कारण अक्सर सड़क परिवहन बाधित होता है, जो एक बड़ी चुनौती है।
  • इन प्राकृतिक आपदाओं से निपटने और सड़कों को जल्द खोलने के लिए संवेदनशील स्थानों पर आपदा प्रबंधन मशीनरी तैनात की जाती है।
  • पर्यटन और तीर्थयात्रा के दौरान ट्रैफिक के भारी दबाव को नियंत्रित करने के लिए प्रमुख मार्गों पर बाईपास और ऑल-वेदर रोड का निर्माण किया जा रहा है।
  • चारधाम ऑल-वेदर रोड परियोजना का उद्देश्य राज्य में हर मौसम में सुरक्षित और बाधा रहित सड़क परिवहन की सुविधा प्रदान करना है।
  • सड़क सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार द्वारा ब्लैक स्पॉट्स (दुर्घटना संभावित क्षेत्रों) की पहचान कर उन्हें ठीक किया जा रहा है।
  • राज्य में बढ़ते वाहनों के पंजीकरण के कारण शहरों में बाईपास और फ्लाईओवरों का जाल बिछाया जा रहा है।
  • परिवहन विभाग द्वारा प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण के लिए ग्रीन मोबिलिटी और इलेक्ट्रिक बसों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • संक्षेप में, उत्तराखंड में मजबूत और सुरक्षित सड़क बुनियादी ढांचा ही यहां के सतत विकास और पर्यटन उद्योग की वास्तविक कुंजी है।

उत्तराखंड: रेल परिवहन

  • उत्तराखंड की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण रेल परिवहन का विकास मुख्य रूप से मैदानी और तराई-भाबर क्षेत्रों तक ही सीमित रहा है।
  • वर्तमान में उत्तराखंड राज्य में रेल लाइनों की कुल लंबाई लगभग 345 किलोमीटर दर्ज की गई है।
  • राज्य का अधिकांश रेल नेटवर्क ब्रॉड गेज (Broad Gauge) यानी बड़ी लाइन पर आधारित है, जो यात्री और माल ढुलाई के काम आता है।
  • हरिद्वार, देहरादून और काठगोदाम राज्य के सबसे प्रमुख रेलवे जंक्शन तथा टर्मिनल स्टेशन हैं।
  • उत्तराखंड में रेल परिवहन का इतिहास ब्रिटिश काल से जुड़ा है, जिसकी शुरुआत 1884 में रामपुर से काठगोदाम लाइन के निर्माण से हुई थी।
  • कुमाऊं क्षेत्र को जोड़ने के बाद, वर्ष 1896 में लक्सर से हरिद्वार तक रेल लाइन का विस्तार किया गया।
  • वर्ष 1900 में रेल लाइन को हरिद्वार से देहरादून तक पहुँचाया गया, जिससे तत्कालीन प्रशासनिक केंद्र मुख्य नेटवर्क से जुड़ गया।
  • वर्ष 1907 में देहरादून-सहारनपुर रेलमार्ग को सुचारू बनाने के लिए प्रसिद्ध मोहंड दर्रे में एक रेलवे सुरंग का निर्माण किया गया था।
  • गढ़वाल क्षेत्र का मुख्य रेल मार्ग लक्सर-हरिद्वार-रायवाला-ऋषिकेश-देहरादून है, जो प्रमुख तीर्थस्थलों और नगरों को जोड़ता है।
  • नजीबाबाद से कोटद्वार मार्ग गढ़वाल क्षेत्र का एक अन्य महत्वपूर्ण रेल संपर्क है, जहाँ कोटद्वार को गढ़वाल का प्रवेश द्वार माना जाता है।
  • कुमाऊं क्षेत्र का मुख्य रेल मार्ग रामपुर/मुरादाबाद से शुरू होकर काशीपुर, लालकुआं और हल्द्वानी होते हुए काठगोदाम तक जाता है।
  • कुमाऊं के सीमावर्ती क्षेत्र में टनकपुर-पीलीभीत रेल मार्ग संचालित है, जिसके अंतर्गत टनकपुर, खटीमा और बनबसा स्टेशन आते हैं।
  • प्रशासनिक रूप से उत्तराखंड का रेल नेटवर्क मुख्य रूप से दो बड़े रेलवे जोनों के अंतर्गत विभाजित है।
  • गढ़वाल क्षेत्र की अधिकांश रेल लाइनों का प्रबंधन उत्तर रेलवे (Northern Railway) के मुरादाबाद रेल मंडल द्वारा किया जाता है।
  • कुमाऊं क्षेत्र की रेल लाइनों की देखरेख पूर्वोत्तर रेलवे (North Eastern Railway) के इज्जतनगर रेल मंडल द्वारा की जाती है।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए 09 किलोमीटर लंबी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन परियोजना का निर्माण तेजी से चल रहा है।
  • रेल विकास निगम लिमिटेड (RVNL) द्वारा निर्मित इस महत्वाकांक्षी परियोजना का लगभग 84 प्रतिशत हिस्सा (105 किमी) सुरंगों से होकर गुजरेगा।
  • ऋषिकेश-कर्णप्रयाग मार्ग पर कुल 12 नए स्टेशन और 17 मुख्य सुरंगें प्रस्तावित हैं, जिसमें देवप्रयाग-लछमोली के बीच की सुरंग सबसे लंबी (1 किमी) होगी।
  • इस बड़ी परियोजना के अलावा चारधाम रेल परियोजना, टनकपुर-बागेश्वर और देहरादून-कालसी-डाकपत्थर रेल विस्तार जैसी योजनाएं भी विचाराधीन हैं।
  • अंततः, जटिल भूवैज्ञानिक संरचना और भूस्खलन जैसी चुनौतियों के बावजूद ये रेल परियोजनाएं उत्तराखंड के आर्थिक विकास और पर्यटन के लिए गेम-चेंजर साबित होंगी।

उत्तराखंड: वायु परिवहन

  • उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में भौगोलिक चुनौतियों के कारण कनेक्टिविटी, पर्यटन और आपदा राहत के लिए वायु परिवहन एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
  • हाल के वर्षों में राज्य के भीतर और बाहर कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए हवाई बुनियादी ढांचे के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया है।
  • उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण (UCADA) राज्य में नागरिक उड्डयन गतिविधियों के विकास और नियमन के लिए जिम्मेदार मुख्य संस्था है।
  • केंद्र सरकार की ‘उड़ान’ (UDAN – उड़े देश का आम नागरिक) योजना के तहत राज्य में क्षेत्रीय हवाई संपर्क को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • राज्य में वर्तमान में मुख्य रूप से दो बड़े चालू हवाई अड्डे, कई छोटी हवाई पट्टियाँ और व्यापक हेलीपैड नेटवर्क उपलब्ध हैं।
  • देहरादून के निकट स्थित जौलीग्रांट हवाई अड्डा उत्तराखंड का सबसे बड़ा और सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है।
  • जौलीग्रांट हवाई अड्डे से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और अहमदाबाद जैसे देश के प्रमुख शहरों के लिए नियमित उड़ानें संचालित होती हैं।
  • इस हवाई अड्डे को भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर के हवाई अड्डे के रूप में विकसित करने की योजना पर काम चल रहा है।
  • ऊधम सिंह नगर जिले में स्थित पंतनगर हवाई अड्डा कुमाऊँ क्षेत्र का प्रमुख और महत्वपूर्ण हवाई संपर्क बिंदु है।
  • पंतनगर हवाई अड्डा नैनीताल और जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क जैसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों तथा क्षेत्रीय औद्योगिक क्षेत्रों के लिए हवाई सेवा प्रदान करता है।
  • पिथौरागढ़ जिले में स्थित नैनी-सैनी हवाई पट्टी को ‘उड़ान’ योजना के तहत हवाई अड्डे के रूप में अपग्रेड और विकसित किया गया है।
  • नैनी-सैनी हवाई अड्डे से देहरादून और गाजियाबाद के हिंडन हवाई अड्डे के लिए सीमित व क्षेत्रीय हवाई सेवाएं संचालित की जाती हैं।
  • चीन सीमा के निकट स्थित होने के कारण नैनी-सैनी हवाई पट्टी का नागरिक उपयोग के साथ-साथ अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक महत्व भी है।
  • उत्तरकाशी जिले में स्थित चिन्यालीसौड़ हवाई पट्टी को स्थानीय स्तर पर ‘माँ गंगा हवाई पट्टी’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • चिन्यालीसौड़ हवाई पट्टी का उपयोग मुख्य रूप से भारतीय वायु सेना द्वारा आपातकालीन और सामरिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।
  • चमोली जिले के गौचर में भी एक महत्वपूर्ण हवाई पट्टी स्थित है, जो आपदाओं के समय राहत और बचाव कार्यों का प्रमुख केंद्र बनती है।
  • उत्तराखंड के सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों और चारधाम तीर्थस्थलों (बद्रीनाथ, केदारनाथ आदि) के लिए हेलीकॉप्टर सेवाएँ जीवन रेखा का कार्य करती हैं।
  • केदारनाथ यात्रा के लिए गुप्तकाशी, सिरसी और फटा जैसे स्थानों से नियमित रूप से निजी व सरकारी हेली-सेवाएँ संचालित की जाती हैं।
  • मानसून के दौरान भूस्खलन और भारी वर्षा से सड़कें अवरुद्ध होने पर यह वायु और हेलीकॉप्टर नेटवर्क राहत सामग्री पहुँचाने में मदद करता है।
  • संक्षेप में, मजबूत वायु परिवहन प्रणाली उत्तराखंड में सुरक्षित तीर्थयात्रा, वैश्विक पर्यटन और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने का एक अनिवार्य स्तंभ है।

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