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लोक कला और शिल्प
- उत्तराखंड की लोक कला और हस्तशिल्प यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और प्राकृतिक परिवेश को दर्शाते हैं।
- राज्य की हस्तशिल्प परंपरा में स्थानीय स्तर पर मिलने वाली प्राकृतिक सामग्रियों का बखूबी उपयोग किया जाता है।
- ‘ऐपण’ (Aipan) उत्तराखंड की सबसे प्रसिद्ध और पारंपरिक रंगोली कला है, जो कुमाऊं क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय है।
- ऐपण कला को मुख्य रूप से शुभ अवसरों, त्योहारों, विवाहों और धार्मिक अनुष्ठानों के समय घरों के देहलीज पर बनाया जाता है।
- इस कला में गेरू के लाल धरातल पर चावल के आटे के घोल (बिस्वार) से उंगलियों की मदद से ज्यामितीय आकृतियाँ उकेरी जाती हैं।
- उत्तराखंड में काष्ठ शिल्प (Wood Carving) की भी एक बहुत पुरानी और अत्यंत समृद्ध ऐतिहासिक परंपरा रही है।
- पुराने समय में यहाँ के घरों के मुख्य दरवाजों और खिड़कियों पर बारीक नक्काशी की जाती थी, जिन्हें ‘खोली’ कहा जाता है।
- उत्तराखंड के पारंपरिक पहाड़ी घरों के आगे बने नक्काशीदार अग्रभाग को स्थानीय भाषा में ‘तिबारी’ के नाम से जाना जाता है।
- थारू और बुक्सा जैसी जनजातियों द्वारा सुंदर हस्तशिल्प, टोकरियाँ और चटाइयाँ बनाने की कला में विशेष महारत हासिल है।
- रिंगाल शिल्प (Ringal Craft) राज्य का एक अन्य प्रमुख कुटीर उद्योग है, जो पहाड़ी बांस (रिंगाल) पर आधारित है।
- चमोली, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जैसे पहाड़ी जिलों में रिंगाल से कंडी, मोस्ता, टोकरी और चटाइयाँ बनाई जाती हैं।
- भोटिया जनजाति के लोग मुख्य रूप से ऊनी हस्तशिल्प जैसे कालीन (दन), पंखी, थुलमा और चुटका बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं।
- राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में तांबे के बर्तन बनाने की कला को ‘टम्टा शिल्प’ (Tamta Craft) कहा जाता है।
- अल्मोड़ा का टम्टा मोहल्ला पारंपरिक रूप से तांबे के उत्कृष्ट उत्पाद और सुंदर गागर बनाने के लिए पूरे देश में विख्यात है।
- मिट्टी के बर्तन बनाने की कला को ‘कुंभकार शिल्प’ कहते हैं, जो स्थानीय स्तर पर घरेलू उपयोग की वस्तुएं तैयार करते हैं।
- उत्तराखंड में मोम के सुंदर खिलौने और मूर्तियां बनाने की कला भी कुछ मैदानी और नगरीय क्षेत्रों में प्रचलित है।
- पहाड़ी शैली के आभूषण जैसे पिछौड़ा, नथुली और गुलबंद यहाँ के सुनारों (सुनार शिल्प) की अनूठी कारीगरी को दर्शाते हैं।
- राज्य में पारंपरिक चर्म शिल्प (Leather Craft) के अंतर्गत कृषि और दैनिक जीवन से जुड़े मजबूत उत्पाद बनाए जाते हैं।
- उत्तराखंड सरकार इन स्थानीय कलाओं के संरक्षण और शिल्पकारों को रोजगार देने के लिए लगातार प्रोत्साहन नीतियां चला रही है।
- आज के समय में उत्तराखंड की इन अनूठी लोक कलाओं और पारंपरिक शिल्पों की मांग देश-विदेश के बाजारों में तेजी से बढ़ रही है।
उत्तराखंड की चित्रकला
- उत्तराखंड की चित्रकला यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक, धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं का एक अत्यंत जीवंत प्रतिबिंब है।
- यहाँ की कलाकृतियाँ न केवल सौंदर्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे लोगों के दैनिक जीवन को भी दर्शाती हैं।
- उत्तराखंड की कला को मुख्यतः दो भागों, पारंपरिक लोक चित्रकला और प्रसिद्ध दरबारी गढ़वाल चित्रकला शैली में विभाजित किया जाता है।
- राज्य की प्राचीनतम चित्रकला के उदाहरण लाखु उडियार और ग्वारख्या गुफा जैसी प्रागैतिहासिक गुफाओं के शैलचित्रों में मिलते हैं।
- लोक चित्रकलाएँ मुख्यतः धार्मिक और सामाजिक अवसरों पर घरों के आंगनों, दीवारों और पूजा स्थलों को सजाने के लिए बनाई जाती हैं।
- कुमाऊँ क्षेत्र की ‘ऐपण’ (Aipan) कला यहाँ की सबसे विशिष्ट, लोकप्रिय और पूजनीय पारंपरिक लोक चित्रकला शैली है।
- ऐपण में धरातल को गेरू (लाल मिट्टी) से लीपा जाता है और चावल के आटे के घोल (बिस्वार) से सफेद आकृतियाँ बनाई जाती हैं।
- इस शैली के अंतर्गत स्वास्तिक, शंख, सूर्य, चंद्रमा, लक्ष्मी पदचिह्न और विभिन्न प्रकार की सुंदर ज्यामितीय आकृतियाँ उकेरी जाती हैं।
- ऐपण के विभिन्न प्रकारों में देवी-देवताओं के आसन के रूप में प्रयुक्त होने वाली ‘चौकी’ और फर्श पर बनी ‘वसुधारा’ शामिल हैं।
- ‘थापा’ (Thapa) भी ऐपण के समान एक दीवार चित्रकला है, जिसमें नंदा देवी और गोलू देवता जैसे स्थानीय लोक देवताओं का चित्रण होता है।
- विवाह और जनेऊ संस्कारों के अवसर पर सौभाग्य के लिए दीवारों पर सप्तमातृकाओं से युक्त ‘ज्यूँति-मातृका’ चित्रकला बनाई जाती है।
- घरों के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर सुरक्षा और समृद्धि के लिए गणेश, लक्ष्मी और मांगलिक चिन्हों से युक्त ‘खोली’ या द्वार पत्र बनते हैं।
- विवाह के शुभ अवसर पर कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को कपड़े या कागज पर बनी ‘बरा-बूंद’ नामक कलाकृति भेंट की जाती है।
- कुमाऊँनी महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले पारंपरिक वस्त्र ‘पिछौड़ा’ (पट्ट चित्र) पर भी सुंदर मांगलिक डिजाइन और छपाई की जाती है।
- ‘गढ़वाल चित्रकला शैली’ पहाड़ी चित्रकला की एक महत्वपूर्ण उपशैली है, जो 17वीं से 19वीं शताब्दी के मध्य खूब फली-फूली।
- लोक कला से भिन्न यह एक दरबारी कला थी, जिसे गढ़वाल के पंवार शासकों (जैसे प्रद्युम्न शाह और सुदर्शन शाह) का संरक्षण मिला।
- महान चित्रकार मोलाराम तोमर (1743-1833) को गढ़वाल चित्रकला शैली का सबसे प्रसिद्ध और सर्वोत्कृष्ट कलाकार माना जाता है।
- मोलाराम ने श्रीनगर में अपनी चित्रशाला खोली थी और उनकी प्रमुख कृतियों में ‘नायिका भेद’, ‘राधा-कृष्ण मिलन’ और ‘चंद्रमुखी’ शामिल हैं।
- मोलाराम के समकालीन प्रसिद्ध चित्रकार चैतू और माणकू थे, जिन्होंने राजा सुदर्शन शाह के दरबार में रहकर ‘रुक्मिणी हरण’ जैसे चित्र बनाए।
- गढ़वाल शैली की मुख्य विशेषताओं में सूक्ष्म रेखांकन, कोमल चटक रंग, भाव प्रवणता और प्राकृतिक सौंदर्य का सुंदर संयोजन दिखाई देता है।
नृत्य और संगीत
- उत्तराखंड की लोक संस्कृति में यहाँ के पारंपरिक नृत्य और संगीत का एक अत्यंत अनूठा और गहरा महत्व है।
- यहाँ के लोक गीत और नृत्य पहाड़ी जीवन की सादगी, संघर्ष, धार्मिक आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य को बयां करते हैं।
- राज्य के संगीत को मुख्य रूप से ऋतु गीत, संस्कार गीत, गाथा (धार्मिक-ऐतिहासिक) गीत और नृत्य गीतों में बांटा गया है।
- ‘झूमेलो’ और ‘बासंती’ यहाँ के प्रमुख ऋतु गीत हैं, जो विशेष रूप से वसंत ऋतु के आगमन की खुशी में गाए जाते हैं।
- जन्म, जनेऊ और विवाह जैसे शुभ अवसरों पर गाए जाने वाले मांगलिक गीतों को स्थानीय भाषा में ‘शकुनाखर’ कहा जाता है।
- ‘खुदेड़’ गीत उत्तराखंड का एक बहुत ही भावुक लोकगीत है, जिसमें मायके की याद में विवाहित कन्या का दर्द झलकता है।
- ‘थड़िया’ नृत्य वसंत पंचमी से लेकर बिखौती (बैसाखी) तक अविवाहित लड़कियों द्वारा चौराहों या आंगनों में किया जाता है।
- ‘छोलिया’ (Choliya) उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का एक अत्यंत प्रसिद्ध और पुराना युद्ध-प्रधान तलवार नृत्य है।
- इस छोलिया नृत्य में डांसर पारंपरिक वेशभूषा पहनकर ढोल, दमाऊ और रणसिंगा की थाप पर युद्ध कौशल का प्रदर्शन करते हैं।
- ‘छपती’ और ‘लमन’ गढ़वाल और कुमाऊं के प्रसिद्ध प्रेम और श्रृंगार रस से भरपूर संवादपरक (सवाल-जवाब वाले) लोकगीत हैं।
- ‘जागर’ (Jagar) उत्तराखंड की एक अनूठी और महान गायन परंपरा है, जिसका उपयोग स्थानीय देवी-देवताओं के आह्वान के लिए होता है।
- जागर गायन में मुख्य गायक को ‘जगरिया’ कहा जाता है, जो डमरू और थाली बजाकर देवताओं की पौराणिक कथाएं गाता है।
- ‘पांडव नृत्य’ गढ़वाल क्षेत्र का एक बेहद लोकप्रिय धार्मिक नृत्य है, जो महाभारत के पात्र पांडवों के जीवन पर आधारित है।
- ‘चांचरी’ और ‘झोड़ा’ कुमाऊं क्षेत्र के सामूहिक नृत्य हैं, जिनमें महिला और पुरुष एक-दूसरे का हाथ पकड़कर वृत्त (घेरा) बनाकर नृत्य करते हैं।
- ‘भोटिया’ जनजाति का ‘पौणा नृत्य’ विवाह के अवसरों पर हाथों में रूमाल लेकर किया जाने वाला एक पारंपरिक मनोरंजन नृत्य है।
- उत्तराखंड के प्रमुख पारंपरिक वाद्यों में ढोल, दमाऊ, हुड़का, मुश्कबीन, रणसिंगा, भंकोरा और डौंर-थाली शामिल हैं।
- पहाड़ी वाद्य यंत्र ‘ढोल’ को उत्तराखंड का आधिकारिक राज्य वाद्य यंत्र होने का गौरव प्राप्त है।
- महान लोक गायक स्वर्गीय नरेंद्र सिंह नेगी और हीरा सिंह राणा जैसे कलाकारों ने उत्तराखंडी संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई है।
- ‘हिलजात्रा’ पिथौरागढ़ का एक कृषि-आधारित मुखौटा नृत्य नाट्य है, जिसमें ‘लखिया भूत’ का पात्र मुख्य आकर्षण होता है।
- आज भी उत्तराखंड के मेले, कौथिग और सामाजिक त्यौहार इन अनूठे लोक नृत्यों और मधुर संगीत के बिना अधूरे माने जाते हैं।
मेले और त्योहार
- उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत यहाँ वर्ष भर आयोजित होने वाले विभिन्न मेलों और त्योहारों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
- ये उत्सव यहाँ के स्थानीय लोगों की गहरी आस्था, सामाजिक जीवन, प्राचीन परंपराओं और प्रकृति के प्रति उनके प्रेम को दर्शाते हैं।
- उत्तराखंड के मेलों और त्योहारों का अपना विशेष धार्मिक, मौसमी, कृषि संबंधी और अनूठा सांस्कृतिक महत्व होता है।
- हरिद्वार में आयोजित होने वाला विश्व प्रसिद्ध ‘कुंभ मेला’ पूरी दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक समागम माना जाता है।
- इसके अतिरिक्त, राज्य की ‘नंदा देवी राजजात यात्रा’ को विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में से एक होने का गौरव प्राप्त है।
- उत्तराखंड के कई प्रसिद्ध मेले स्थानीय लोक देवी-देवताओं और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं से गहराई से जुड़े हुए हैं।
- इन सभी पारंपरिक उत्सवों के अवसरों पर लोक नृत्य, पारंपरिक लोकगीत और स्थानीय व्यंजनों का विशेष महत्व होता है।
- ‘हरेला’ (Harela) त्योहार मुख्य रूप से कुमाऊँ क्षेत्र में श्रावण मास के प्रथम दिन बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
- यह त्योहार मुख्य रूप से प्रकृति, हरियाली और भूमि की उर्वरता का प्रतीक है, जिसमें घरों में विभिन्न प्रकार के अनाज बोए जाते हैं।
- ‘फूलदेई’ (Phool Dei) अथवा फूल संक्रांति का त्योहार चैत्र मास के प्रथम दिन वसंत ऋतु के आगमन की खुशी में मनाया जाता है।
- इस दिन छोटे बच्चे और कन्याएँ सुबह-सुबह घरों की देहरी पर ताजे फूल डालकर “छम्मा देई, देहली भरी भरी” गीत गाते हैं।
- ‘घी संक्रांति’ (Ghee Sankranti) या ओलगिया का पावन त्योहार भाद्रपद मास की संक्रांति को फसलों के पकने की खुशी में मनाते हैं।
- इस त्योहार पर पशुधन की वृद्धि की कामना की जाती है, पारंपरिक रूप से घी का सेवन करना और उपहार देना शुभ माना जाता है।
- मकर संक्रांति को उत्तराखंड में ‘उत्तरायणी’ पर्व के रूप में मनाया जाता है, जिसमें पवित्र नदियों में स्नान और दान का महत्व है।
- कुमाऊँ क्षेत्र में मकर संक्रांति को ‘घुघुतिया’ भी कहते हैं, जहाँ आटे और गुड़ से “घुघुते” बनाकर कौवों को खिलाए जाते हैं।
- मकर संक्रांति के इसी पावन अवसर पर बागेश्वर जिले में प्रसिद्ध ‘उत्तरायणी मेला’ बहुत बड़े स्तर पर आयोजित किया जाता है।
- बैशाख मास की संक्रांति को मनाया जाने वाला ‘बिखोती’ या विषुवत संक्रांति भी राज्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण लोक पर्व है।
- ये मेले और त्योहार बिखरे हुए समाज को आपस में जोड़ने और लोक कलाओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- आधुनिक समय में भी उत्तराखंड के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में इन त्योहारों की मूल महत्ता पूरी तरह से सुरक्षित है।
- संक्षेप में, उत्तराखंड के मेले और त्योहार यहाँ की जीवंत जीवनशैली और अद्वितीय लोक संस्कृति की अमूल्य पहचान हैं।
उत्तराखंड : फिल्म और नाट्यकला का इतिहास
- उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता से फिल्म निर्माताओं को लुभाने के साथ-साथ एक समृद्ध क्षेत्रीय सिनेमा और नाट्य परंपरा समेटे हुए है।
- राज्य की यह विशिष्ट कला परंपरा यहाँ की स्थानीय संस्कृति, लोक भाषाओं और विभिन्न सामाजिक मुद्दों को बखूबी प्रतिबिंबित करती है।
- वर्ष 1983 में प्रदर्शित हुई “जगवाल” उत्तराखंड के इतिहास की सबसे पहली गढ़वाली फिल्म थी, जिसके निर्माता पारेश्वर गौड़ थे।
- वर्ष 1985 में बनी “घरजवैं” को उत्तराखंड के सिनेमा इतिहास की सबसे सफल और महत्वपूर्ण प्रारंभिक गढ़वाली फिल्म माना जाता है।
- कुमाऊँनी भाषा की पहली फिल्म “मेघा आ” मानी जाती है, जिसका निर्माण वर्ष 1987 में जीवन सिंह बिष्ट द्वारा किया गया था।
- उत्तराखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि पर आधारित प्रसिद्ध फिल्म “तेरी सौं” (2003) का कुशल निर्देशन अनुज जोशी ने किया था।
- उत्तराखंड की नैसर्गिक सुंदरता ने हमेशा से बॉलीवुड को आकर्षित किया है, जिसके कारण नैनीताल, मसूरी और ऋषिकेश शूटिंग के लिए लोकप्रिय हैं।
- यहाँ “मधुमती”, “सिलसिला”, “कोई मिल गया”, “बत्ती गुल मीटर चालू” और “केदारनाथ” जैसी प्रसिद्ध हिंदी फिल्मों की शूटिंग हुई है।
- राज्य में फिल्म निर्माण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उत्तराखंड सरकार द्वारा वर्ष 2015 में नई फिल्म नीति लागू की गई।
- इसके बाद राज्य में फिल्म निर्माण की सुविधाओं को सुगम बनाने के लिए वर्ष 2016 में ‘उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद’ का गठन हुआ।
- उत्कृष्ट प्रयासों के चलते उत्तराखंड को वर्ष 2018 और 2019 में “मोस्ट फिल्म फ्रेंडली स्टेट” का प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
- उत्तराखंड में नाट्यकला की भी एक समृद्ध और बेहद प्राचीन परंपरा रही है, जो आज भी विभिन्न पारंपरिक लोकनाट्यों के रूप में जीवित है।
- चमोली जिले के सलूड़-डूंगरा गाँव का प्रसिद्ध अनुष्ठानिक लोकनाट्य ‘रम्माण’ प्रतिवर्ष अप्रैल माह में मुखौटा नृत्य के रूप में आयोजित होता है।
- इस ऐतिहासिक रम्माण लोकनाट्य को 2 अक्टूबर 2009 को यूनेस्को द्वारा ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ घोषित किया गया है।
- गढ़वाल क्षेत्र का प्रसिद्ध ‘पांडव लीला या नृत्य’ महाभारत की पौराणिक कथाओं और प्रसंगों पर आधारित एक अनूठी नृत्य-नाटिका है।
- पिथौरागढ़ की सोरघाटी में मनाया जाने वाला ‘हिलजात्रा’ कृषि-पशुपालन से जुड़ा मुखौटा नृत्य है, जिसमें ‘लखिया भूत’ मुख्य पात्र होता है।
- दशहरा के पावन अवसर पर पूरे राज्य में रामलीला का मंचन होता है, जिसमें अल्मोड़ा की रामलीला अपनी विशिष्ट गायन शैली के लिए प्रसिद्ध है।
- उत्तराखंड में आधुनिक रंगमंच के विकास और इसके प्रणेता के रूप में महान कलाकार मोहन उप्रेती को मुख्य रूप से जाना जाता है।
- प्रसिद्ध जनकवि और लेखक गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ ने भी अपने क्रांतिकारी नाटकों और गीतों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया।
- संक्षेप में, उत्तराखंड में सिनेमा और नाट्यकला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि यहाँ की धरोहरों को संरक्षित करने का सशक्त माध्यम हैं।
उत्तराखंड के लोक वाद्य यंत्र
- उत्तराखंड के लोक वाद्य यंत्र यहाँ की अनूठी सांस्कृतिक पहचान, लोक गीतों और पारंपरिक नृत्य शैलियों की आत्मा माने जाते हैं।
- राज्य के इन वाद्य यंत्रों का उपयोग मुख्य रूप से धार्मिक अनुष्ठानों, मांगलिक उत्सवों, मेलों और विभिन्न सामाजिक लोक कलाओं में किया जाता है।
- बनावट और ध्वनि के आधार पर उत्तराखंड के लोक वाद्यों को मुख्य रूप से चर्म, सुषिर, धातु और तंत वाद्य श्रेणियों में बांटा गया है।
- ‘ढोल’ (Dhol) उत्तराखंड का सबसे प्रमुख चर्म वाद्य यंत्र है, जिसे राज्य सरकार द्वारा उत्तराखंड का “आधिकारिक राज्य वाद्य” घोषित किया गया है।
- पारंपरिक ढोल को तांबे, पीतल या एल्युमिनियम धातु पर बकरी की खाल मढ़कर बहुत ही कुशलता से तैयार किया जाता है।
- ढोल के साथ हमेशा बजने वाले छोटे और अर्द्ध-गोलाकार वाद्य यंत्र को ‘दमाऊ’ (Damau) या दमामा कहा जाता है।
- उत्तराखंड की पौराणिक गाथाओं के गायन और देवी-देवताओं के आह्वान (जागर) में ढोल-दमाऊ की जोड़ी का बजना अनिवार्य होता है।
- ‘हुड़का’ (Hurka) कुमाऊँ क्षेत्र का एक अत्यंत लोकप्रिय चर्म वाद्य है, जो आकार में डमरू जैसा लेकिन उससे थोड़ा बड़ा होता है।
- हुड़के का उपयोग मुख्य रूप से खरीफ की खेती के समय ‘हुड़किया बौल’ सामूहिक श्रम गीतों और छोलिया नृत्य के दौरान किया जाता है।
- ‘डौंर’ (Daunr) भी डमरू के आकार का वाद्य है, जिसका उपयोग विशेष रूप से गढ़वाल क्षेत्र में जागर और पूजा-पाठ में किया जाता है।
- डौंर के साथ हमेशा कांसे की ‘थाली’ (Thali) बजाई जाती है, जिसकी खनकदार आवाज जागर गायन में लय पैदा करती है।
- ‘रणसिंगा’ (Ransingha) तांबे से बना फुँककर बजाया जाने वाला (सुषिर) वाद्य है, जो प्राचीन काल में युद्ध की शुरुआत के समय बजता था।
- रणसिंगा का आकार अंग्रेजी के ‘S’ अक्षर जैसा मुड़ा हुआ होता है और आज इसे विवाह आदि शुभ कार्यों में बजाया जाता है।
- ‘भंकोरा’ (Bhankora) पूरी तरह सीधे आकार का तांबे का सुषिर वाद्य है, जो केवल गढ़वाल के पारंपरिक धार्मिक उत्सवों में बजता है।
- ‘मोछंग’ (Mochang) लोहे से बना एक छोटा सा अनूठा वाद्य यंत्र है, जिसे होठों के बीच दबाकर उंगली से कंपन देकर बजाया जाता है।
- ‘बिनई’ (Binai) भी मोछंग की तरह धातु से निर्मित वाद्य है, जिसे मुख्य रूप से ग्रामीण महिलाएं फुर्सत के पलों में बजाती थीं।
- ‘मुश्कबीन’ (Mushkbeen/Bagpipe) मूल रूप से स्कॉटिश वाद्य है, जिसे उत्तराखंडी सेना के जवानों द्वारा लाकर यहाँ की शादियों का अभिन्न हिस्सा बनाया गया।
- ‘सारंगी’ और ‘इकतारा’ राज्य के पारंपरिक तंत (तार वाले) वाद्य हैं, जिनका उपयोग घुमंतू गायकों द्वारा लोक कथाएं सुनाने के लिए होता था।
- ‘मंजीरा’ और ‘झांझ’ पीतल व कांसे से बने धातु वाद्य (घन वाद्य) हैं, जो कीर्तन और भजनों में ताल देने के काम आते हैं।
- आज के आधुनिक युग में भी उत्तराखंड के ये पारंपरिक लोक वाद्य यहाँ के समाज और पहाड़ों की लोक चेतना को जीवंत बनाए हुए हैं।