ब्रिक्स की उत्पत्ति और सदस्य: ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के इस प्रभावशाली समूह की स्थापना 2009 में एक बहुध्रुवीय विश्व बनाने हेतु हुई थी।
ऐतिहासिक विस्तार (2024): ब्रिक्स का विस्तार करते हुए मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई जैसे नए देशों को इसमें शामिल किया गया है।
वैश्विक प्रभाव का पैमाना: ब्रिक्स देश मिलकर दुनिया की 45% से अधिक आबादी, 30% से अधिक भूभाग और वैश्विक GDP के लगभग एक-तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।
पश्चिमी आधिपत्य का संतुलन: ब्रिक्स समूह G7 देशों और पश्चिमी प्रभुत्व वाले वित्तीय संस्थानों के विकल्प के रूप में ग्लोबल साउथ को एक मजबूत आवाज देता है।
न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB): ब्रिक्स देशों ने 100 अरब डॉलर की पूंजी के साथ शंघाई में NDB की स्थापना की, जो बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वित्तपोषित करता है।
आकस्मिक तरलता व्यवस्था (CRA): विदेशी मुद्रा संकट और अल्पकालिक भुगतान संतुलन की समस्याओं से निपटने के लिए ब्रिक्स देशों का यह एक साझा वित्तीय सुरक्षा तंत्र है।
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार: डॉलर पर निर्भरता (De-dollarization) कम करने के लिए ब्रिक्स देश आपसी व्यापार को अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में निपटाने पर बल दे रहे हैं।
भारत के लिए रणनीतिक लाभ: भारत ब्रिक्स के जरिए रूस, मध्य-पूर्व और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ अपने आर्थिक, ऊर्जा और कूटनीतिक संबंध मजबूत करता है।
चीन के साथ संतुलन की चुनौती: ब्रिक्स के मंच पर चीन के अत्यधिक प्रभाव को संतुलित करना और भारत के अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करना एक निरंतर कूटनीतिक चुनौती है।
आतंकवाद पर कड़ा रुख: भारत ने ब्रिक्स घोषणापत्रों में सीमा पार आतंकवाद, लश्कर/जैश जैसे संगठनों की निंदा और वित्तीय फंडिंग रोकने के प्रस्ताव शामिल कराए हैं।
डिजिटल और स्वास्थ्य सहयोग: ब्रिक्स वैक्सीन अनुसंधान केंद्र और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) के क्षेत्र में भारत ने अपनी तकनीकी विशेषज्ञता साझा की है।
कृषि और खाद्य सुरक्षा: कृषि अनुसंधान मंच के माध्यम से ब्रिक्स देश जलवायु-अनुकूल बीजों, दालों और खाद्य सुरक्षा तकनीकों का आपसी आदान-प्रदान करते हैं।
ऊर्जा सुरक्षा की मजबूती: नए ऊर्जा-सम्पन्न देशों (ईरान, यूएई) के जुड़ने से भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश को रियायती और सुरक्षित तेल आपूर्ति का लाभ मिलता है।
बहुध्रुवीय व्यवस्था का निर्माण: भारत ब्रिक्स को किसी देश-विरोधी गुट के रूप में नहीं, बल्कि समावेशी बहुध्रुवीय विश्व और संस्थागत सुधारों के मंच के रूप में देखता है।
ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: ब्रिक्स में भारत की सक्रिय भागीदारी विकासशील देशों की प्राथमिकताओं, ऋण संकट और जलवायु न्याय को विश्व पटल पर प्रमुखता दिलाती है।