सिद्धांत की उत्पत्ति: 1960 के दशक में हैरी हेस (Harry Hess) ने महासागरीय बेसिन के मानचित्रण और ध्वनि तरंग (सोनार) अध्ययनों के आधार पर ‘सी-फ्लोर स्प्रेडिंग’ की अवधारणा दी।
संवहन धारा सिद्धांत (Convection Theory): आर्थर होम्स ने मैंटल में रेडियोधर्मी ताप से उत्पन्न तापीय संवहन धाराओं का मॉडल दिया, जो समुद्री पर्पटी को दूर धकेलने की मुख्य ऊर्जा है।
मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridges): महासागरों के बीच स्थित विशाल पर्वत श्रृंखलाओं के अक्षीय कटक से निरंतर मैग्मा बाहर निकलता है और नई महासागरीय पर्पटी का निर्माण करता है।
विस्तार की प्रक्रिया: मध्य कटक से निरंतर निकल रहा नया बेसाल्टिक लावा ठंडा होकर जमता है और पूर्व-निर्मित पुरानी समुद्री पर्पटी को दोनों ओर दूर धकेलता रहता है।
चट्टानों की युवा आयु: समुद्री नितल की चट्टानें महाद्वीपीय शैलों (3.8 अरब वर्ष) की तुलना में अत्यधिक नवीन हैं; किसी भी समुद्री पर्पटी की आयु 20 करोड़ वर्ष से अधिक नहीं है।
कटक से दूरी और आयु संबंध: मध्य-महासागरीय कटक के दोनों ओर समान दूरी पर स्थित चट्टानों की आयु, रासायनिक संरचना और चुंबकीय गुण पूरी तरह एक समान पाए जाते हैं।
पुराचुंबकीय पट्टियां (Paleomagnetic Striping): समुद्री बेसाल्ट में बंद चुंबकीय खनिज पृथ्वी के चुंबकीय उत्क्रमण के इतिहास को कटक के समानांतर ‘सामान्य’ और ‘उत्क्रमित’ पट्टियों में दर्शाते हैं।
अवसादों की मोटाई में भिन्नता: मध्य-महासागरीय कटकों के शीर्ष पर अवसाद बहुत पतले या अनुपस्थित होते हैं, जबकि कटकों से दूर जाने पर अवसादी परतों की मोटाई बढ़ती जाती है।
महासागरीय गर्त एवं विनाश (Trenches): यदि कटकों पर नई पर्पटी बनती है, तो महासागरीय गर्तों (Trenches) में पुरानी पर्पटी मैंटल में जाकर पुनः पिघलती है, जिससे पृथ्वी का आकार स्थिर रहता है।
सिद्धांत का महत्व: समुद्री नितल विस्तार ने वेगनर के विस्थापन सिद्धांत की यांत्रिकी को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया और आधुनिक ‘प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत’ की मजबूत नींव रखी।