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जिला परिषद (Zila Parishad)

पंचायती राज का शीर्ष स्तर: जिला परिषद पंचायती राज प्रणाली की जिला स्तर पर सर्वोच्च और सबसे शक्तिशाली संस्था है, जो पूरे जिले के ग्रामीण विकास की निगरानी करती है।

संवैधानिक आधार: संविधान के अनुच्छेद 243B(1) के तहत प्रत्येक जिले में ग्रामीण क्षेत्रों के सुनियोजित विकास के लिए जिला परिषद का गठन अनिवार्य है।

संरचना: इसमें वार्डों से सीधे चुने गए जिला परिषद सदस्य (DDC), जिले के सभी ब्लॉक प्रमुख, स्थानीय विधायक, सांसद और राज्यसभा सदस्य शामिल होते हैं।

जिला परिषद अध्यक्ष: निर्वाचित सदस्य अपने बीच से एक ‘जिला परिषद अध्यक्ष’ (Zila Parishad Chairperson) और एक उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं।

मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO): जिला परिषद का प्रशासनिक प्रमुख ‘CEO’ होता है, जो सामान्यतः राज्य कैडर का IAS या वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी होता है।

समन्वय और पर्यवेक्षण: यह जिले की सभी पंचायत समितियों (ब्लॉक स्तर) और ग्राम पंचायतों के कार्यों का समन्वय, मार्गदर्शन और वित्तीय पर्यवेक्षण करती है।

जिले की विकास योजना: जिला परिषद पूरे जिले के लिए वार्षिक विकास योजना तैयार करती है और उसे अंतिम रूप देने हेतु जिला योजना समिति (DPC) को भेजती है।

बजट की मंजूरी: यह अपने अधीन आने वाली सभी पंचायत समितियों (ब्लॉक पंचायतों) के वार्षिक बजट की जांच करती है और उन्हें मंजूरी प्रदान करती है।

सरकारी अनुदान का वितरण: केंद्र और राज्य सरकारों से मिलने वाले पंचायती राज विकास फंड को विभिन्न पंचायत समितियों और ग्राम पंचायतों के बीच आवंटित करती है।

बड़े बुनियादी ढांचे का निर्माण: अंतर-ब्लॉक सड़कें, जिला स्तरीय ग्रामीण अस्पताल, बड़े पुल, व्यावसायिक परिसर और माध्यमिक स्तर के शिक्षण संस्थानों का विकास।

स्थायी समितियां: विकास, वित्त, शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज कल्याण से जुड़ी विभिन्न स्थायी समितियां जिला परिषद के विस्तृत नीतिगत निर्णयों में सहायता करती हैं।

कार्यकाल: जिला परिषद का कार्यकाल 5 वर्ष होता है; यदि इसे समय से पहले भंग किया जाए, तो 6 महीने के भीतर नए चुनाव कराने होते हैं।

आरक्षण प्रणाली: अध्यक्ष पद और सदस्यों के चुनाव में महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए नियमानुसार आरक्षण लागू होता है।

जिला प्रशासन से संबंध: जिला परिषद का जिलाधिकारी (DM) और विभिन्न जिला स्तरीय विकास अधिकारियों (CDO/CMO) के साथ गहरा प्रशासनिक संपर्क और समन्वय रहता है।

ग्रामीण-शहरी नियोजन सेतु: जिला परिषद संपूर्ण जिले के ग्रामीण क्षेत्रों की प्राथमिकताओं को राज्य सरकार के सामने रखकर नीतिगत फैसले करवाती है।

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