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भारतीय मूर्तिकला (Indian Sculpture)

प्राचीन एवं सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Sculpture)

  • त्रआयामी कला: वास्तुकला के विपरीत, भारतीय मूर्तिकला मुख्य रूप से त्रिआयामी (3D) रूप में स्वतंत्र रूप से विकसित हुई है।
  • कांस्य ढलाई (Bronze Casting): सिंधु घाटी में ‘लुप्त मोम तकनीक’ (Lost-wax process) का उपयोग करके धातु की मूर्तियां बनाई जाती थीं।
  • नर्तकी की मूर्ति: मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांसे की ‘डांसिंग गर्ल’ दुनिया की सबसे पुरानी कांस्य मूर्तियों में से एक है।
  • दाढ़ी वाले पुजारी: मोहनजोदड़ो की स्टेआटाइट (सेलखड़ी) से बनी ‘दाढ़ी वाले पुरुष’ की आवक्ष मूर्ति अपनी बारीक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।
  • टेराकोटा मूर्तियां: सिंधु सभ्यता में पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) से खिलौने और ‘मातृदेवी’ (Mother Goddess) की आकृतियां बनाई जाती थीं।
  • हड़प्पाई मुहरें: इन मुहरों पर एकतरफा नक्काशीदार (Relief) रूप में एकसिंगी बैल और पशुपति शिव की आकृतियां उकेरी गई थीं।

मौर्य और मौर्योत्तर काल (Mauryan & Post-Mauryan Era)

  • राजकीय दरबारी मूर्तिकला: मौर्य काल में सम्राटों द्वारा एकाश्म पत्थरों को तराश कर भव्य पशु राजशीर्ष (Capitals) बनवाए गए।
  • सारनाथ सिंह शीर्ष: अशोक के सारनाथ स्तंभ का सिंह शीर्ष भारतीय मूर्तिकला और हमारे राष्ट्रीय प्रतीक का सर्वोच्च उदाहरण है।
  • यक्ष और यक्षिणी: मौर्य काल में लोक कला के तहत पटना और दीदारगंज से आदमकद विशाल पत्थर की मूर्तियाँ मिली हैं।
  • भरहुत और सांची: मौर्योत्तर काल में स्तूपों की वेदिकाओं और तोरणद्वारों पर बुद्ध के जातक कथाओं की मूर्तियां उकेरी गईं।
  • शालभंजिका आकृति: सांची स्तूप के तोरण द्वारों पर झुकी हुई स्त्री (शालभंजिका) की मूर्तियां उर्वरता का प्रतीक मानी जाती हैं।

मूर्तिकला की प्रमुख शैलियाँ (Three Main Schools of Art)

  • गांधार कला शैली: उत्तर-पश्चिम में विकसित इस शैली पर यूनानी (हेलेनिस्टिक) कला का भारी प्रभाव था, जिसमें यथार्थवाद प्रमुख था।
  • गांधार बुद्ध: इसमें बुद्ध के घुंघराले बाल, मूंछें और उनके कपड़ों की तहें रोमन टोगा की तरह दिखाई देती हैं।
  • मथुरा कला शैली: यह विशुद्ध स्वदेशी शैली थी, जिसमें मूर्तियों के निर्माण के लिए चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर प्रयुक्त होता था।
  • मथुरा बुद्ध: यहाँ बुद्ध की मूर्तियां मुस्कुराते चेहरे, मुंडे हुए सिर और आध्यात्मिक दृढ़ता वाले मर्दाना रूप में बनी हैं।
  • अमरावती कला शैली: दक्षिण भारत में कृष्णा नदी के पास विकसित इस शैली में सफेद संगमरमर का प्रचुर उपयोग किया गया।
  • कथात्मक मूर्तियां: अमरावती शैली में एकल मूर्तियों के बजाय त्रिभंग मुद्रा में बुद्ध के जीवन की सामूहिक कथाएं उकेरी गई हैं।

गुप्तकालीन मूर्तिकला का स्वर्णकाल (Gupta Sculptures)

  • आध्यात्मिक सौंदर्य: गुप्त काल में मूर्तिकला में नग्नता समाप्त हुई और चेहरे पर गहरी शांति एवं आध्यात्मिकता को प्राथमिकता दी गई।
  • सल्तनतगंज बुद्ध: गुप्त काल की साढ़े सात फीट ऊंची कांसे की यह मूर्ति धातु कला का बेहतरीन नमूना है।
  • सारनाथ के उपदेशक बुद्ध: धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में बैठे बुद्ध की यह पत्थर की मूर्ति गुप्त मूर्तिकला का शिखर है।
  • वराह अवतार मूर्ति: विदिशा की उदयगिरि गुफाओं में भगवान विष्णु के वराह रूप द्वारा पृथ्वी को बचाने का जीवंत दृश्य है।

मध्यकालीन एवं दक्षिण भारतीय शैलियाँ (Medieval & Southern Dynasties)

  • चट्टान कटी मूर्तियां: एलोरा का रावण द्वारा कैलाश पर्वत उठाने का दृश्य रॉक-कट मूर्तिकला की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
  • पल्लव मूर्तिकला: महाबलीपुरम में पत्थर पर उकेरा गया ‘गंगा अवतरण’ या ‘अर्जुन की तपस्या’ दुनिया का सबसे बड़ा रिलीफ पैनल है।
  • राष्ट्रकूट कला: एलिफेंटा गुफा की ‘त्रिमूर्ति’ (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की विशाल मूर्ति शांत और दिव्य भाव प्रकट करती है।
  • चोल कांस्य मूर्तियां: चोल शासकों के काल में दक्षिण भारत में कांस्य मूर्तिकला अपने तकनीकी और कलात्मक चरमोत्कर्ष पर पहुंची।
  • नटराज की मूर्ति: तांडव नृत्य करते शिव की चोल कांस्य मूर्ति गतिशीलता, संतुलन और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का वैश्विक प्रतीक है।
  • चंदेल कला (खजुराहो): खजुराहो के मंदिरों की बाहरी दीवारों पर बनी मूर्तियां मानवीय भावनाओं और सौंदर्य का अनूठा उत्सव हैं।
  • होयसल नक्काशी: बेलूर-हेलबिडु में सोपस्टोन (नरम पत्थर) पर की गई आभूषणों जैसी महीन नक्काशी पूरी दुनिया में अद्वितीय है।
  • महाबलशाली गोमतेश्वर: श्रवणबेलगोला में स्थित बाहुबली की 57 फीट ऊंची एकाश्म मूर्ति जैन मूर्तिकला का भव्य उदाहरण है।
  • नायक और विजयनगर: इस मध्यकालीन काल में घोड़ों और पौराणिक जीवों (याली) की आक्रामक और सजीव मूर्तियां स्तंभों पर बनीं।

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