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मंदिर वास्तुकला के मूल तत्व (Basic Elements)
- गर्भगृह (Garbhagriha): यह मंदिर का मुख्य छोटा कमरा होता है, जहां मुख्य देवी या देवता की मूर्ति स्थापित की जाती है।
- मण्डप (Mandapa): यह गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर स्थित एक बड़ा स्तंभों वाला हॉल होता है, जहां भक्त एकत्र होते हैं।
- शिखर और विमान: उत्तर भारत के स्वतंत्र मंदिरों में इसे घुमावदार ‘शिखर’ और दक्षिण भारत में पिरामिडनुमा ‘विमान’ कहा जाता है।
- वाहन और ध्वज: गर्भगृह के ठीक सामने मुख्य अक्ष पर देवता का वाहन और एक विशाल स्तंभ (ध्वज) स्थित होता है।
- सांधार प्रकार: मंदिर वास्तुकला का वह प्रकार जिसमें गर्भगृह के चारों ओर ढका हुआ प्रदक्षिणापथ (परिक्रमा मार्ग) नहीं होता है।
- निरंधार प्रकार: इस श्रेणी के मंदिरों में गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा के लिए एक ढका हुआ प्रदक्षिणापथ मौजूद होता है।
- सर्वतोभद्र प्रकार: यह अत्यंत विशिष्ट मंदिर संरचना है, जिसके गर्भगृह में चारों दिशाओं से प्रवेश किया जा सकता है।
वास्तुकला का क्रमिक विकास (Evolution Stages)
- प्रथम चरण: गुप्त काल के शुरुआती मंदिर चपटी छत वाले, चौकोर और एक कम ऊंचे चबूतरे पर बनाए जाते थे।
- द्वितीय चरण: इस चरण में चबूतरे ऊंचे किए गए और गर्भगृह के चारों ओर ढके हुए प्रदक्षिणापथ जोड़े गए।
- तृतीय चरण: समतल छतों के स्थान पर घुमावदार शिखरों का उदय हुआ और ‘पंचायतन शैली’ की शुरुआत इसी समय हुई।
- चतुर्थ चरण: इस काल के मंदिर काफी हद तक तृतीय चरण जैसे थे, लेकिन मुख्य मंदिर अधिक आयताकार होने लगे।
- पंचम चरण: इस अंतिम चरण में हल्के आयताकार उभारों के साथ गोलाकार या वृत्ताकार मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ।
- पंचायतन शैली: मुख्य मंदिर के साथ चार कोनों पर चार सहायक छोटे मंदिर होना इस शैली की प्रधान विशेषता है।
नागर शैली – उत्तर भारत (Nagara Style)
- नागर विशेषता: उत्तर भारतीय शैली के मंदिर ऊंचे पत्थरों के चबूतरों पर बनते हैं, जिनमें विशाल प्रवेश द्वार नहीं होते।
- द्वार पर नदियाँ: नागर मंदिरों में गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर पवित्र नदी देवी गंगा और यमुना की मूर्तियाँ होती हैं।
- अमलक और कलश: शिखर के सबसे ऊपरी ऊर्ध्वाधर छोर पर एक क्षैतिज डिस्क (अमलक) और उस पर कलश स्थापित होता है।
- लैटिना शिखर (रेखा-प्रसाद): यह चौकोर आधार वाला साधारण शिखर है, जिसकी दीवारें ऊपर की ओर अंदर की तरफ झुकती हैं।
- फामसाना शिखर: यह लैटिना की तुलना में अधिक चौड़े और छोटे होते हैं, जिनकी छतें सीधे ढलान पर मिलती हैं।
- वल्लभी शिखर: यह आयताकार इमारतें होती हैं जिनकी छत वैगन-वॉल्टेड (बांस की गाड़ी जैसी गोलाकार) चैंबर जैसी दिखती है।
क्षेत्रीय नागर शैलियाँ (Regional Nagara Variations)
- मध्य भारत कला: देवगढ़ का दशावतार मंदिर पंचायतन शैली और खजुराहो का कंदारिया महादेव मंदिर भव्य शिखरों के उत्तम उदाहरण हैं।
- चौंसठ योगिनी मंदिर: मोरेना का यह वृत्ताकार मंदिर तांत्रिक पूजा से जुड़ा है, जिससे संसद भवन का डिजाइन प्रेरित माना जाता है।
- पश्चिमी भारतीय शैली: गुजरात और राजस्थान के मंदिरों में बावड़ियों (जल निकायों) का उपयोग और सफेद संगमरमर की नक्काशी प्रमुख है।
- पूर्वी भारतीय शैली: ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर में मुख्य मंदिर (देउल) के आगे नृत्य मंडप (जगमोगन) रथ आकार में है।
- अहोम और बांग्ला छत: असम में कामाख्या मंदिर और बंगाल में बांस की झोपड़ी जैसी ढलवां ‘बांग्ला छत’ वाली वास्तुकला विकसित हुई।
- पहाड़ी वास्तुकला: कश्मीर और कुमाऊं के मंदिरों में गांधार कला के प्रभाव के साथ लकड़ी की ढलवां छतों का मिश्रण मिलता है।
द्रविड़ और वेसर शैली (Dravida & Vesara Styles)
- द्रविड़ विशेषता: दक्षिण भारतीय मंदिरों के चारों ओर विशाल चारदीवारी और ऊंचे भव्य प्रवेश द्वार होते हैं, जिन्हें ‘गोपुरम’ कहते हैं।
- द्वारपाल रक्षक: द्रविड़ शैली में गर्भगृह या मुख्य गोपुरम के द्वारों पर पहरेदार के रूप में ‘द्वारपालों’ की मूर्तियां होती हैं।
- पल्लव कला: महाबलीपुरम के तटीय मंदिर और चट्टानों को तराश कर बनाए गए रथ मंदिर दक्षिण की प्रारंभिक द्रविड़ शैली हैं।
- चोल वास्तुकला: तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर अपने विशाल बहुमंजिला विमान और उत्कृष्ट कांस्य मूर्तियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
- वेसर शैली: चालुक्य और होयसल राजाओं के संरक्षण में नागर और द्रविड़ शैलियों के मिश्रण से यह हाइब्रिड शैली बनी।